Wednesday, August 9, 2023

कृषि‍ रसायनों के प्रयोग में सावधानियाँ



कृषि‍ रसायनों के प्रयोग में सावधानियाँ

आधुनिक वैज्ञानिक खेती के युग में अधिक पैदावार लेने के लिए फसल सुरक्षा अति आवश्‍यक है। कीटनाशी (Insecticide), फफूंदनाशी (Fungicides) एवं अन्य कृषि रसायन जो फसल सुरक्षा में प्रयोग होते हैं, प्राय: बहुत जहरीले व हानिकारक होते हैं।
इन रसायनों का प्रयोग करते समय सावधानी रखना भी उतना ही आवष्यक हैं, जितना कि इनसे फसल सुरक्षा व अधिक पैदावार एवं अच्छी गुणवत्ताा वाली फसल लेकर अधिक लाभ उठाना। फसलों की पैदावार में कमी होने के कई कारणो में से कीट व बिमारियाँ मुख्य भूमिका निभाते है।
अधिक उत्पादन लेने हेतु बुआई से पूर्व बीजोपचार तथा बुवाई के उपरान्त कीट नियन्त्रण एवं समय-समय पर बीमारियों से बचाव हेतु विभिन्न रासायनिक दवाओं का प्रयोग किया जाता है। जिनमें से अधिकांश रसायन अति विषाक्त होते है। जितनी आवश्‍यकता इनके प्रयोग करने की हैं उससे कहीं अधिक आवष्यकता इनके प्रयोग में सावधानी रखने की है।
जैवनाशकों (antibiotic) को निर्धारित मात्रा से अधिक या गलत तरीके से या असावधानी से प्रयोग करने पर कई हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। जैवनाशक रसायन न केवल मनुष्यों बल्कि पशुओं पक्षियों इत्यादि के लिए भी अति हानिकारक होते है।
इन जैवनाशक रसायनों के प्रयोग सें किसी भी प्रकार की दुर्घटना या हानि से बचने के लिए या इनका पर्यावरण पर कोई बुरा असर ना पड़ें इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखने के साथ-साथ इनके प्रयोग के समय क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिये, इनकी जानकारी भी किसानों को होना अति आवष्यक है। जैवनाशकों के घातक प्रभावों से बचने के लिए यह आवष्यक होता है कि उन पर लिखे हुए निर्देषों का पालन नियमानुसार किया जावे। जिनमें किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। इसलिए इनका प्रयोग करते समय हमें अत्यधिक सावधानी रखनी चाहिए।
जैवनाशकों की खरीददारी के समय सावधानियाँ :

कीट व रोग की पहचान व उसकी गम्भीरता के आधार पर सिफारिष किऐ गये जैवनाशक ही खरीदें।

इन जैवनाशक रसायनों के विषैलेपन की जानकारी को पैकिंग पर छपे बर्फीनुमा आकृति के रंगों से समझना चाहिए। लाल रंग सबसे अधिक विषैला तथा पीला, नीला व हरा रंग क्रमष: कम विषैले होते है। यथासम्भव सुरक्षित रसायनों का ही चयन करें।

जैवनाशकों के निर्माता, इनमें उपस्थित सक्रिय तत्व तथा निष्क्रिय तिथि को ध्यान में रख कर उसका अनुसरण करें। ताकि उपयोगकर्ता को ज्यादा पुराना नही दिया जावे।

जैवनाशक खरीदते, उनके भण्डारण व उपयोग करते समय बच्चों को शामिल नही करना चाहिए।

जैवनाशक जैवनाशक हमेषा मूल पैकिंग में ही खरीदने चाहिए। खुली पैकिंग वाला कीट व रोग नाषी कभी ना खरीदें।

जैवनाशकों के अनुसार ही जैवनाशकों की खरीदारी करें।

खरीदते समय साबुन की टिकिया व अंगोछा या तौलिया अवष्य खरीदें जिनका इन रसायनों का प्रयोग करने के बाद अलग से उपयोग कर सकें।

जैवनाशक अच्छा गुणवत्ताा का होना चाहिये। जिससे अधिक लाभ मिल सकें।

जैवनाश्‍कों के प्रयोग से पहले सावधानियाँ :

जैवनाशक के प्रयोग करने से पहले पैकेट पर लेबल व दी गई निर्देष पुस्तिका अवष्य पढें।

केवल निर्धारित मात्रा में ही जैवनाशकों का प्रयोग करें।

जैवनाशकों के प्रयोग से पहले छिड़काव यंत्र की अच्छी तरह जाँच कर लें तथा पानी डालकर ताकी बाद में परिक्षण कोई रिसाव या परेषानी न हों।

घर में काम आने वाले बर्तनों को छिड़काव के लिए कभी भी इस्तेमाल नही करना चाहिए।

जैवनाशकों को पानी में हाथ से नही मिलाना चाहिए। बल्कि हाथों में दस्ताने पहनकर किसी लकडी की छडी से ही मिलाएं।

छिड़काव करते समय मुँह पर साफ कपड़ा या मास्क का होना अति आवष्यक है।

जहा तक संम्भव हो सकें अपने शरीर को कपड़ों से पूरा ढक कर छिड़काव करें।

शरीर पर किसी भी प्रकार का तेल या अन्य कोई भी पदार्थ लगाकर छिड़काव न करें।

छिडकाव करने से पहले देख लेवे की शरीर का कोई भाग चोटिल नही है। यदि चोटिल हो तो किसी दूसरे व्यक्ति से छिड़काव करावाये।

जैवनाशकों का प्रयोग एक ही छिड़काव यंत्र से कभी न करें उनके लिये अलग-अलग छिड़काव यंत्र का प्रयोग करे या छिडकाव यंत्र को अच्छी तरह पानी से साफ करके प्रयोग करे।

यदि बरसात या आंधी आने की संभावना हो तो जैवनाशकों का प्रयोग स्थगित कर देना चाहिऐं। छिड़काव के बाद अगर बारिष हो जाए तो फिर से छिड़काव कर देवे।

जैवनाशकों का प्रयोग करते समय रखी जाने वाली सावंधानियॉ:-

जैवनाशक के डिब्बों को ऑंखों व नाक से दूर रखकर खोलें।

जैवनाशकों का प्रयोग करते समय उचित परिधान उपयोग में लें।

बीज उपचार करते समय हाथों में दस्तानों पहनने आवष्यक है। उपचारित बीज को छाया में सुखायें और इसे बाकी अनाज से अलग रखें । बीज उपचार बिजाई से 1-2 दिन पहले कर लेना चाहिए।

दानेदार जैवनाशक प्रयोग करते समय हाथों में दस्ताने पहनना अति आवष्यक है। इन कीट व रोगनाषकों का केवल निर्धारित मात्रा के अनुसार ही प्रयोग करें। ज्यादा मात्रा का प्रयोग करने से यह पौधों पर हानिकारक प्रभाव दिखाते है।

जैवनाशका रसायनों का भुरकाव व छिड़काव सुबह के समय करना अति प्रभावी होता है। क्योंकि सुबह वातावरण नम रहता है।

जैवनाशकों का छिड़काव करते समय यह ध्यान रखें की ये रसायन पदार्थ शरीर के किसी भाग पर नही गिरना चाहिए।

जैवनाशकों का छिड़काव करते समय कम से कम एक आदमी को साथ रखे कभी भी अकेले छिड़काव नही करें।

शराब व अन्य नषीले पदार्थो का सेवन करके छिड़काव न करें।

जैवनाशकों को घर या पषुओं के रहने के स्थान पर न मिलाएं बल्कि खेत में सुरक्षित स्थान पर ही मिलाए।

छिड़काव यंत्र को ऊपर तक पूरा न भरें, बल्कि कुछ भाग खाली रहने दे।

जैवनाशकों का छिड़काव करते समय नाक व मुंह को किसी साफ कपड़ें से ढक ले एवं ऑंख पर चष्मा लगा लेवे।

जैवनाशकों का छिड़काव करते समय कपडों के ऊपर स्प्रे ओवर कोट का प्रयोग करना चाहिए।

जैवनाशकों का छिड़काव करते समय धूम्रपान, तम्बाकू चबाना या अन्य खाद्य पदार्थो का सेवन न करें, ये सभी करने से पहले छिड़काव यन्त्र को एक तरफ रखकर साबुन से हाथ मुंह धो लें।

जैवनाशकों रसायनों का छिड़काव व भुरकान करते समय छिड़काव करने वाले व्यक्ति को वायु की दिषा के साथ साथ चलना चाहिए। ऐसा करने से रसायन उसके ऊपर नहीं गिरेगा।

जैवनाशकों का छिड़काव करने के बाद गाय-भैंस का दुध नही निकाले उससे पहले अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोना चाहिए।

कीट व रोगनाषक छिड़काव के बाद की सावधानियाँ

जैवनाशक के छिड़काव के बाद साबुन से भली-भॉति स्नान करना चाहिए तथा छिड़काव करते समय प्रयोग किये गये परिधानों को भी साबुन से अच्छी तरह धो ले।

जैवनाशकों का छिडकाव करते समय थोडी मात्रा स्टीकर (जैसे गोर, साबून) सुबह या शाम को ही करना चाहिए।

छिडकाव के बाद बचे हुए जैवनाशकों को मूल पैकिंग मे ढक्कन बंद करके सुरक्षित स्थान पर बच्चों की पहुॅच से रखें।

जैवनाशकों के छिड़काव के बाद छिड़काव यंत्र को पानी से धो कर साफ करें एवं सुखा कर रखे।

जैवनाशकों के छिड़काव के बाद कोई तकलीफ महसूस हो तो घरेलू उपाय अपनाकर तुरंत डॉक्टर की सलाह ले तथा उपचार करवाएं।

जैवनाशकों के खाली डिब्बों को जला दें या इनके छोटे-छोटे टुकडें करके पीने के पानी के स्त्रोत से दूर किसी अन्य जगह पर दबा दें। प्लास्टिक व धातु के डिब्बे या ड्रमों को दो या तीन बार पानी से धोयें तथा बाद में तोड़कर चपटा बनाकर पानी के स्त्रोत से दूर जमीन में दबा दें।

थोडी मात्रा में बचे हुऐ जैवनाशकों को किसी अन्य स्थान पर पानी के स्त्रोत से दूर या खेत में एक तरफ गड्डे में डालकर डिब्बे को भी तोड़कर दबा दें।

उपचारित खेतों में से कुछ दिनों तक चारा, सब्जी इत्यादि का प्रयोग ना करें।

उपचारित खेतों में बैठ कर कुछ दिनों तक खाना पीना ना करें।

छिड़के गये जैवनाशकों का ब्योरा लिखकर रख लेना चाहिए।

जैवनाशकों को छिड़कने के बाद उस जगह किसी मनुष्य व जानवर को नही जाने देना चाहिए।

जैवनाशकों का भण्डारण

जैवनाशकों को हमेषा ठण्डे हवादार सूखे व खाली कमरे में बच्चों की पहुॅच से बाहर ताला लगा कर रखे ।

जैवनाशकों को अलमारी में अलग-अलग खानों में लेबल लगा कर रखें ताकि गलती से उनका उल्टा-पुल्टा प्रयोग न हो सकें, तथा आसानी से ढूंढा जा सकें।

जैवनाशकों का भण्डार रसोई या सोने के कमरे में नही करना चाहिए।

कीट व रोगनाषक को रिहायषी स्थान, पशु, चारे व पालतू जानवरों से दूर बंद कमरे में रखें।

कीट व रोगनाषक को खुले कमरे, टपकती छत, टीन या एसबैस्टस की छत वाले कमरे में न रखे।

कीट व रोगनाषक को किसी अन्य बोतल या डिब्बे में भण्डारण ना करें, इन्हें मूल पैकिंग में ही रखें।

कीट व रोगनाषकों को पहचानने के लिए उन्हें सूंघना या चखना नहीं चाहिए बल्कि उन पर लिखे लेबल को पढकर उसकी पहचान करना चाहिए।

इस तरह उपरोक्त सावधानियों को ध्यान में रखते हुए यदि रसायनों को प्रयोग किया जाये तो इनसे होने वाले हानिकारक दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।

धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग और उनका प्रबंधन

 

धान एक प्रमुख खाद्द्यान फसल है, जो पूरे विश्व की आधी से ज्यादा आबादी को भोजन प्रदान करती है। चावल के उत्पादन में सर्वप्रथम चाइना के बाद भारत दूसरे नंबर पर आता है। भारत में धान की खेती लगभग 450 लाख हैक्टर क्षेत्रफल में की जाती है छोटी होती जोत एवं कृषि श्रमिकों की अनुपलब्धता व जैविक, अजैविक कारकों के कारण धान की उत्पादकता में लगातार कमी आ रही है। इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखरे हुये आज हम इस लेख में धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग तथा पहचान और उनके प्रबंधन के बारे में बात करेंगे जिससे कि हमारे किसान साथी अपनी धान की फसल में उस रोग की समय से पहचान करके फसल का बचाव कर सकें। 



1. धान का झोंका रोग  

यह धान की फसल का मुख्य रोग है जो एक पाइरीकुलेरिया ओराइजी नामक फफूंद से फैलता है। 

रोग के लक्षण इस रोग के लक्षण पौधे के सभी वायवीय भागों पर दिखाई देते हैं। परंतु सामान्य रूप से पत्तियां और पुष्पगुच्छ की ग्रीवा इस रोग से अधिक प्रभावित होती हैं। प्रारंभिक लक्षण पौधे की निचली पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते हैं जब ये धब्बे बड़े हो जाते हैं तो ये धब्बे नाव अथवा आंख की जैसी आकृति के जैसे हो जाते हैं। इन धब्बों के किनारे भूरे रंग के तथा मध्य वाला भाग राख जैसे रंग का होता है। बाद में धब्बे आपस में मिलकर पौधे के सभी हरे भागों को ढक लेते हैं जिससे फसल जली हुई प्रतीत होती है। 

रोग प्रबंधन

• रोगरोधी क़िस्मों का चयन करना चाहिए। 

• बीज का चयन रोगरहित फसल से करना चाहिए।

• बीज को सदैव ट्राइकोडरमा से उपचारित करके ही बुवाई करना चाहिए। 

• फसल की कटाई के बाद खेत में रोगी पौध अवशेषों एवं ठूठों इत्यादि को एकत्र करके नष्ट कर देना चाहिए।

• फसल में रोग नियंत्रण हेतु बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। 

2. जीवाणु झुलसा या झुलसा रोग   

यह रोग जेंथोमोनास ओराइजी नामक जीवाणु से फैलता है। इसे 1908 में जापान में सबसे पहले देखा गया था।

रोग की पहचान 

पौधों की चोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह बीमारी कभी भी लग सकती है। इस रोग में पत्तिया नोंक अथवा किनारों से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगती हैं। सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढ़े मेढ़े या झुलसे हुये दिखाई देते हैं। इन सूखे हुये पीले पत्तों के साथ साथ राख़ के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं। संक्रामण की उग्र अवस्था में पत्ती सूख जाती है। बालियों में दाने नहीं पड़ते हैं।  

रोग प्रबंधन

• शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें। 

• बीजों को बुआई करने से 2.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और 25 ग्राम कापर आक्सी क्लोराइड के घोल में 12 घंटे तक डुबोयें।  

• इस बीमारी को लगने की अवस्था में नत्रजन का प्रयोग कम कर दें। 

• जिस खेत में बीमारी लगी हो उस खेत का पानी किसी दूसरे खेत में न जाने दें। साथ ही उस खेत में सिंचाई न करें।  

• बीमारी को और अधिक फैलने से रोकने के लिए खेत में समुचित जल निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए। 

3. धान का भूरा धब्बा रोग 

यह एक बीज जनित रोग है जो हेलिमेन्थो स्पोरियम ओराइजी नामक फफूंद द्वारा फैलता है। इस रोग की वजह से 1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया था। 

रोग की पहचान  

इस रोग में पत्तियों पर गहरे कत्थई रंग के गोल अथवा अण्डाकार धब्बे बन जाते हैं। इन धब्बों के चारों तरफ पीला घेरा बन जाता है तथा मध्य भाग पीलापन लिये हुए कत्थई रंग का होता है तथा पत्तियां झुलस जाती हैं। दानों पर भी भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। इस रोग का आक्रमण पौध अवस्था से लेकर दाने बनने की अवस्था तक होता है।

4. शीत झुलसा या आवरण झुलसा रोग 

यह एक फफूंद जनित रोग है, जिसका रोग कारक राइजोक्टोनिया सोलेनाई है। पूर्व में इस रोग को अधिक महत्व का नहीं माना जाता था। अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपभोग करने वाली प्रजातियों के विकास से यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जो कि उपज में 50 प्रतिशत तक नुकसान कर सकता है। 

रोग की पहचान 

इस रोग का संक्रमण नर्सरी से ही दिखना आरंभ हो जाता है, जिससे पौधे नीचे से सड़ने लगते हैं। मुख्य खेत में ये लक्षण कल्ले बनने की अंतिम अवस्था में प्रकट होते हैं। लीफ शीथ पर जल सतह के ऊपर से धब्बे बनने शुरू होते हैं। इन धब्बों की आकृति अनियमित तथा किनारा गहरा भूरा व बीच का भाग हल्के रंग का होता है। पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में कई छोटे छोटे धब्बे मिलकर बड़ा धब्बा बनाते हैं। इसके कारण शीथ, तना, ध्वजा पत्ती पूर्ण रूप से ग्रसित हो जाती है और पौधे मर जाते हैं। खेतों में यह रोग अगस्त एवं सितंबर में अधिक तीव्र दिखता है। संक्रमित पौधों में बाली कम निकलती है तथा दाने भी नहीं बनते हैं। 

रोग प्रबंधन

• धान की रोगरोधी प्रजातियों का चयन करें। 

• शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें। 

• बीजों को फफूंद नाशक से उपचारित करके बुआई करें। 

• मुख्य खेत एवं मेड़ों को खरपतवार से मुक्त रखें।

• संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। 

• नाइटोजन उर्वरकों को दो या तीन बार में देना चाहिए। 

• खेतों से फसल अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए।

• फसल में रोग नियंत्रण हेतु बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। 

5. धान का खैरा रोग 

यह बीमारी जस्ता की कमी के कारण होती है। इसके लगने पर पौधे की निचली पत्तियां पीली पड़ना शुरू हो जाती हैं और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के अनियमित धब्बे उभरने लगते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पौधे की पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं। कल्ले कम निकलते हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। 

रोग प्रबंधन

• धान की फसल में यह बीमारी न लगे उसके लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ की दर से रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए। 

• बीमारी लगने के बाद इसकी रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 1 किलोग्राम चूना 250 से 300 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 10 दिन के बाद फिर से स्प्रे करें। 

6. आभासी कंड रोग या ध्वज कंड रोग या हल्दी रोग 

यह रोग क्लेविसेप्स ओराइजी नामक फफूंद से फैलता है। पहले इस रोग का ज्यादा महत्व का नहीं माना जाता था बल्कि इसे किसान के लिए शुभ संकेत माना जाता था। परंतु अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपयोग करने वाली प्रजातियों के विकास तथा जलवायु परिवर्तन से अब यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जोकि संक्रमण के अनुसार उपज में 2 से 40 प्रतिशत तक नुकसान करता है।

रोग की पहचान  

इस रोग के लक्षण पौधों की बालियों में केवल दानों पर ही दिखाई देते हैं। रोगजनक के विकसित हो जाने के कारण बाली में कहीं कहीं बिखरे हुए दाने बड़़े मखमल के समान चिकने हरे समूह में बदल जाते हैं, जो अनियमित रूप में गोल अंडाकार होते हैं। इनका रंग बाहरी ओर नारंगी पीला और मध्य में लगभग सफेद होता है, इस रोग से बाली में कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं।

समन्वित रोग प्रबंधन 

1. सदैव बीज उपचार करके ही बुवाई करनी चाहिए|  

2. खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। 

3. खेत की तैयारी के वक्त खेत की सफाई कर उसकी गहरी जुताई करके तेज़ धूप लगने के लिए खुला छोड़ देंना चाहिए। 

4. फसल में रोग नियंत्रण हेतु बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। 

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