Monday, August 14, 2023

भिंडी की खेती : भिंडी आर्का की जैविक खेती कैसे करें

 भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) पूरे देश मे की जाती है। भिंडी की मांग पूरे साल रहती है । और ऑफ सीजन में भिंडी का रेट भी अच्छा मिलता है । इसलिए भिंडी की खेती किसानों के लिए एक अच्छा आय का स्रोत है । भिंडी को okra भी कहते हैं।


कुरकुरी भिंडी या फिर भरवां भिंडी की यह सब्जी सभी की खास पसन्द है । भिंडी सब्जी के अलावा इसके औषधीय गुणों के लिए भी महत्वपूर्ण है । इसमें पाए जाने वाले तत्व हमारे शरीर को पोषण देते हैं । तथा कई खतरनाक बीमारियों से भी बचाते हैं । भिंडी में 30 फीसदी कैलोरी होती है । भिंडी vitamin C व मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत माना जाता है। भिंडी का पानी मधुमेह जैसी कई बीमारियों से बचाता है ।
Okra juice benefits in hindi
एक गिलास भिंडी के रस में

– 6 ग्राम कार्बोहाइड्रेट
– 80 माइक्रोग्राम फोलेट
– 3 ग्राम फाइबर और
– 2 ग्राम प्रोटीन मिलता है ।
भिंडी खाने के फायदे –
– भिंडी मधुमेह डायबिटीज कम करता है ।
– कोलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करता है ।
– अस्थमा के रोगियों के लिए भिंडी रामबाण है ।
– शरीर मे इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है ।
-जैतून तेल में नींबू का रस मिलाकर पीने से कमाल का रिजल्ट मिलता है ।
– भिंडी गुर्दे की बीमारी को दूर करती है ।
घर मे भिंडी का रस बनाने का तरीका –
ताजी 5 से 6 भिंडी लें । इन सभी को इनके किनारे से काट लें । फिर बीच से काटकर एक बर्तन में रख लें । फिर उसमें एक दो कटोरी पानी डालकर 4 से 5 घण्टे के लिए रख दें । इसके बाद जब समय हो जाये । भिंडी के सभी टुकड़ो को निचोडकर निकाल लें । एक गिलास में भिंडी के रस को डालें । अगर कम हो तो सादा पानी मिला लें । इसे नाश्ते के पहले पीने से मधुमेह व मोटापा कम करने में मदद मिलती है। भिंडी का रस अपच भी दूर करता है ।

जलवायु व तापमान –

Climate and temperature for bhindi ki kheti
फसल ग्रीष्म तथा खरीफ, दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है।भिंडी का पौधा दीर्घ अवधि का गर्म व नम वातावरण में अच्छा विकास करता है। भिंडी के बीज उगने के लिये 27-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उपयुक्त होता है। 17 डिग्री से कम जलवायु भिंडी के बीज में अंकुरण नही होता है ।

भूमि का चयन

Land selection
भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) के लिए कार्बनिक जीवाश्म युक्त दोमट भूमि अच्छी होती है । भिंडी की उन्नत खेती के लिए भूमि का पी0 एच मान 7.0 से 7.8 होना चाहिए ।
आमतौर पर सभी प्रकार की भूमि में लिया जा सकता है। फिर भी, अच्छी तरह से सूखा, अच्छी तरह से सूखा, तलछटी और मध्यम आकार की मिट्टी अधिक उपयुक्त है। अत्यधिक काली मिट्टी में, मानसून के दौरान, पानी भरा जा रहा है, इसलिए गर्मी के मौसम में जमीन की फसल अच्छी तरह से काटी जा सकती है।

मिट्टी की तैयारी –

Soil preparation for okra cultivation
पिछली फसल की अच्छी तरह से खेती करने और पिछली फसल के कटे हुए खरपतवारों को अच्छी तरह से पोंछने के बाद। मरम्मत और मरम्मत के लिए जमीन तैयार करना। इस तरह की तैयार मिट्टी में, उर्वरक द्वारा उर्वरक के साथ-साथ आधार में रासायनिक उर्वरक प्रदान करने के लिए हल द्वारा हल खोला जाता है।

भिंडी की उन्नत किस्में

Advanced Varieties of Okra for lady finger farming
पूसा ए-4 : यह किस्म ICAR नई दिल्ली द्वारा 1995 में विकसित की गई है । फल 12 से 15 सेमी लंबे व आकर्षक होते हैं । यह किस्म एफिड तथा जैसिड तथा पीतरोग यैलो वेन मोजैक विषाणु रोग के प्रति सहनशील है । बुवाई के दो हफ्ते में फूल निकलते है व डेढ़ माह में पहली तुड़ाई के लिए फल तैयार हो जाते हैं । गर्मी में 10 टन व खरीफ में 15 टन तक उपज मिलती है ।
VRO – 6 : यह किस्म 2003 में भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी द्वारा विकसित की गई है । इसे काशी प्रगति भी कहा जाता है। भिंडी की यह किस्म येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी हैं। इस किस्म का पौधा वर्षा ऋतु में 175 सेमी तथा गर्मी में 130 सेमी लम्बा होता है । इस किस्म से उपज गर्मी में 13.5 टन एवं बरसात में 18.0 टन प्रति हे0 तक होती है।
हिसार उन्नत : वर्षा तथा गर्मियों दोनों मौसमों में उगाई जाने वाली यह प्रजाति चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा निकाली विकसित की गई है । इस किस्म के पौधे 90-120 सेमी तक ऊंचाई वाले होते हैं । तथा इंटरनोड पासपास होते हैं ।पौधे में 3-4 शाखाएं प्रत्येक नोड से निकलती हैं। इस किस्म के फल 15-16 सेंमी लम्बे हरे तथा आकर्षक होते हैं। पहली तुड़ाई हेतु 46-47 दिनों बाद भिंडी में फल तैयार हो जाते है । 12-13 टन प्रति है की दर से उपज मिलती है।
अर्का अभय : येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी यह प्रजाति भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई है ।
यह प्रजाति है। इसके पौधे ऊँचे 120-150 सेमी सीधे तथा अच्छी शाखा युक्त होते हैं।
अर्का अनामिका : येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी यह उन्नत भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई है। दोनों मौसमों में उगाई जाती है । पौधे 120-150 सेमी तक होती ह उपज तक 12-15 टन प्रति है0 तक मिलती है ।
परभनी क्रांति : भिंडी की यह पीत-रोगरोधी प्रजाति का विकास 1985 में मराठवाड़ाई कृषि विश्वविद्यालय, परभनी द्वारा किया गया है ।फल गहरे हरे एवं 15-18 सेंमी लम्बे होते हैं। बुवाई के 50 दिन बाद फल आना शुरू हो जाते हैं । इस किस्म की पैदावार 9-12 टन प्रति है।
पंजाब-7 : यह किस्म भी पीतरोग रोधी है। यह प्रजाति पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा निकाली गई है। फल हरे एवं मध्यम आकार के होते हैं। बुआई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते हैं। इसकी पैदावार 8-12 टन प्रति है।

बुवाई का समय –

Time of sowing
भिंडी की पूरे साल मांग रहती है । इसलिए इसे दो मौसमों में उगाया जाता है । मानसून के खरीफ मौसम में यह फसल जून-जुलाई महीने में बोई जाती है । तो वहीं गर्मियों के लिए फरवरी-मार्च में बोई जाती है।

बुवाई विधि और बीज दर –

Sowing method and seed rate
भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) में बीज की मात्रा उन्नत किस्म, मिट्टी की क्वालिटी, बुवाई की दशाओं पर निर्भर करता है । ख़रीफ़ की फसल में कम बीज लगता है। वहीं ग्रीष्म क़ालीन भिंडी की खेती में बीज की मात्रा लगभग दुगुनी लगती है। वर्षा क़ालीन भिंडी की खेती में 8-10 किलोग्राम तथा ग्रीष्म क़ालीन भिंडी की खेती में 18-20 किलोग्राम उन्नत किस्म का प्रमाणित बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई के पहले बीज को 10-15 घंटे तक पानी में भिगो दे । फिर बीज को निकाल कर छाया में एक घंटे लगभग सुखा लें। ऐसा करने से बीज में अंकुरण अच्छा होता है। खेत में बीजों को लाइन से लाइन की दूरी 45-60 सेमी0 व पौध से पौध की दूरी 25-30 सेमी0 के अंतरण पर 3-4 सेमी0 गहराई पर बो दें।

उर्वरक

Fertilizer
आजकल जैविक खाद से तैयार सब्जियों का बाजार में मूल्य अच्छा मिलता है । इसलिए जहां तक हो सके रासायनिक खादों का प्रयोग न करके, जैविक खादों का ही प्रयोग करें । भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) हेतु तैयारी के समय 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खाद डालें। इसके अलावा रासायनिक ऊर्वरक के रूप में नाइट्रोजन 100,फास्फोरस 60 तथा पोटाश 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से दें। खेत की तैयारी से पहले नत्रजन की 40 किलोग्राम व फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा मिट्टी में मिला दें । शेष बची नाइट्रोजन की मात्रा को खड़ी फसल में दो बार टॉप ड्रेसिंग के माध्यम से दें।

सिंचाई

Irrigation
मानसून में भिंडी की फसल में अधिक सिचाई की जरूरत नही पड़ती है । लेकिन गर्मियों के सिचाई का विशेष ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है । ड्रिप विधि से सिंचाई करके अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । इससे सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी की अनावश्यक बर्बादी भी रोकी जा सकती है ।

निराई गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण –

Weeding and weed control
भिंडी की फसल (bhindi ki kheti ) में शुरुआत में समय समय पर निराई – गुड़ाई कर खरपतवार निकालते रहें । तथा पौधों की जड़ों में मिट्टी चढ़ा दें । मानसून की भिंडी की फसल में 4 से 5 बार निराई – गुड़ाई कर दें। इसके बाद 15-20 दिन में एक बार निराई करें। इसके अलावा रासायनिक खरपतवार नाशक के रूप में पेंडिमिथालीन या फ्लुक्लोरालिन का भी प्रयोग कर सकते हैं । पैडीमिथालिन (स्टाम्प) 1.0 कि0ग्रा0 या बेसालिन 10 लीटर प्रति ग्राम को 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर में छिड़काव करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

फसल संरक्षण –

Crop Protection
भि‍ंडी की खेती में होने वाली बीमारियां व उनकी रोकथाम
पीला रोग- bhindi ki kheti में लगने वाला यह भयंकर रोग है। इसके प्रकोप से पौधों में फलन कम होती है । बीमारी में भिण्डी के पत्तो पर पीली रंग की धारियां पड़ जाती है और उस के बाद पूरा पता पीला हो जाता है जिस के कारण फल का रंग पीला हो जाता है । इसके उपचार के सावधानी बरतें। बुवाई के पहले की पीला रोग प्रतिरोधी क़िस्मों की बुवाईं करें। हिसार उन्नत या पी-8, पी-7 यह पीला रोग प्रतिरोधी क़िस्में हैं इन्हें अपनाएँ। रोगी पौधे को उखाड़कर ज़मीन के नीचे दबा दें। या फिर खेत से दूर ले जाकर जला दें।
सस्कोस्पोरा झुलसा – भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) को झुलसा सबसे अधिक नुक़सान पहुँचाता है। इस रोग के करन फलों की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है। इस रोग के कारण भिण्डी के पत्ताो पर विभिन्न प्रकार के लम्बूतरे धब्बे उभर आते हैं तथा किनारों से मुड़ जाते है। इस रोग के बचाव हेतु शुरुआत में ही झुलसा प्रतिरोधी क़िस्मों का चुनाव करें तो बेहतर है। इसके अलावा रोगी पौधे को उखाड़कर ज़मीन के नीचे दबा दें। या फिर खेत से दूर ले जाकर जला दें। डायथेन एम-45 (0.25%) 250 ग्राम दवाई का 200-300 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 15 दिनों के पश्चात फिर से उस दवाई का छिड़काव करे।

भि‍ण्‍डी की खेती में लगने वाले कीट व उनकी रोकथाम

भिंडी में लगने वाले कीट का नामहानिकारक कीट की विशेषताएँरोकथाम व उपचार
लालमाईट कीटअष्टपदी नामक कीट लालमाइट कीट लाल रंग का कीट है। इस कीट के शिशु तथा व्यस्क दोनो की भिंडी की फसल को हानि पहुँचाते हैं। यह पत्तों के नीचे की सतह से रस चूसते है। पत्तियों को पोषण न मिलने के कारण व आकार छोटा हो जाता है। रस चूसने के कारण पत्तियों में धब्बे बन जाते है। वयस्क लाल कीट भिण्डी के पर मकड़ी की तरह जाला बना देते है । तथा पत्तियों के नोक पर जमा हो जाते हैं। इस कीट के कारण पत्ते सूख जाते हैं। पौधें में फलन कम लगती है।लाल माइट कीट की रोकथाम के लिए प्रेम्पट 25 ई0सी0 600 मि0ली0 बाय की दवाई का 400-600 लीटर पानी के साथ घोल बनाकर एक हेक्टेयर भूमि के अन्दर छिड़काव करने से लाल माईट को नियन्त्रित किया जा सकता है।
भिंडी की सफेद मक्खीसफेद मक्खी भी लालमाइट के जैसे ही फसल को नुक़सान पहुँचाती है । पत्तियों की नीचे की सतह पर शिशु एवं वयस्क कीट चिपक कर रस चूसते हैं। पत्तियों को पोषण ना मिलने के कारण पौधे की पत्तियों में पीला सिरारोग (येलो मौजेक वायरस) रोग फैल जाता है । मानसून वाली भिंडी की खेती में यह रोग तेज़ी से फैलता है।भिंडी की सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण के लिए 300-500 मि0ली0 मैलाथियान 50 ई0सी0 नामक दवाई को 200-300 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर एक एकड़ भूमि में छिड़काव करें।
फली छेदक सुण्डियांयह कीट पौधे की टहनियों तथा पत्तियों में व कलियों में छेद करती है । उसके बाद फल में सुराख करके फल को नुकसान पहुंचाती है । सुण्डियों के प्रकोप की प्रारंभिक अवस्था में टहनियां झडने लगती हैं और पौधा मर जाता है। फल विकृत हो जाते हैं। जिससे फलों की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है। किसं को अच्छा बाज़ार भाव नही मिल पाता है। जिस के कारण किसान की फसल का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता इसके कारण किसान को हानि होती है। विकसित हो रहा फल विकृत हो जाता है।फली छेदक सूड़ियो के फसल पर लक्षण देखते ही मैलाथियॉन 0.05% या कार्बेरिल 0.1% या 75-80 मि0ली0 स्पाईनोसैड 45 ई0सी0 को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें। एक हेक्टेयर के लिए मात्रा डबल कर लें। तथा दो सप्ताह के बाद एक छिड़काव और कर दें
हरा तेलाभिंडी के फसल पर लाल माइट व सफ़ेद मक्खी की भाँति हरा तेला कीट के शिशु व व्यस्क कीट कोमल पत्तियों के नीचे की सतह से कोषिकाओं के रस को चूस लेते है। जिस के कारण पत्तियों की उपरी सतह छोटे-छोटे हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते है। पोषण ना मिलने से पत्ते पीले पड़कर सूख जाते हैं।भिण्डी को तेले से बचाने के लिए मेलाथियान 0.05% (100 मि0ली0 साईथियान/मैलाथियॉन/मासथियॉन 50 ई0सी0) दवाई को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें

हार्मोन छिड़काव –

Hormones spraying
वैज्ञनिकों का मानना है कि भिंडी की फसल पर हार्मोन्स के छिड़काव से 5 फीसदी तक उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सकती है । गुजरात कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार 3 PPM की दर से साइकोसाइल हार्मोन का छिड़काव करने से पौधे में फलियों की संख्या बढ़ जाती है ।

उपज

Yield
कृषि की सभी दशाएं सामान्य रही तो भिंडी की खेती से 3 से 5 टन हरी फली का उत्पादन प्रति हेक्टेयर मिल सकता है ।


अरबी की खेती | घुइयाँ की खेती

 



अरबी की खेती हेतु जलवायु एवं तापमान | Taro Arabi Kheti Suitable Climate and Temperature

कृषि विशेषज्ञों का कहना है अरबी की फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
इसलिए इसे ग्रीष्म और बारिश दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। जायद सीजन में इसे अप्रैल में उगा सकते हैं। अरबी की बुआई के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिट्‌टी अच्छी रहती है। इससे कड़ी परत न हो। साथ ही जल निकासी की अच्छी पर्याप्त व्यवस्था हो। इसमें गर्मी के दिनों में 6-7 दिन के अंतराल में सिंचाई करना जरूरी है।

भूमि और तैयारी | Field Preparation for TARO Root Farming

अरबी की अच्छी फसल लेने के लिए बलुई दोमट आदर्श भूमि हैं| दोमट और चिकनी दोमट में भी उत्तम जल निकास के साथ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती हैं| इसकी खेती के लिए 5. 5 से 7.0 पी एच मान वाली भूमि उपयुक्त होती हैं| रोपण हेतु खेत तैयार करने के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल एवं दो जुताई कल्टीवेटर से करके पाटा चलाकर मिट्टी को भुरीभुरी बना लेना चाहिए|

उन्नत किस्में | Advanced New Improved Varieties For Arbi Cultivation

इंदिरा अरबी 1-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार और हरे रंग के होते हैं| तने (पर्णवृन्त) का रंग ऊपर- नीचे बैंगनी तथा बीच में हरा होता हैं| इस किस्म में 9 से 10 मुख्य पुत्री धनकंद पाये जाते है| इसके कंद स्वादिष्ट खाने योग्य होते हैं और पकाने पर शीघ्र पकते हैं, यह किस्म 210 से 220 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 22 से 33 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

श्रीरश्मि-

इसका पौधा लम्बा, सीधा और पत्तियाँ झुकी हुई, हरे रंग की बैंगनी किनरा लिये होती है| तना (पर्णवृन्त) का ऊपरी भाग हरा, मध्य तथा निचला भाग बैंगनी हरा होता हैं| इसका मातृ कंद बडा और बेलनाकार होता हैं| पुत्री धनकंद मध्यम आकार के व नुकीले होते हैं| इस किस्म के कंद कंदिकाएँ, पत्तियां और पर्णवृन्त सभी तीक्ष्णता (खुजलाहट) रहित होते हैं तथा उबालने पर शीघ्र पकते हैं| यह किस्म 200 से 201 दिन में खुदाई के लिये तैयार हो जाती हैं और इससे औसत 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती हैं|

पंचमुखी-

इस किस्म में सामान्यतः पॉच मुख्य पुत्री कंदिकाये पायी जाती हैं, कंदिकायें खाने योग्य होती है और पकने पर शीघ्र पक जाती हैं| रोपण के 180 से 200 दिन बाद इसके कंद खुदाई योग्य हो जाते हैं| इस किस्म से 18 से 25 टन प्रति हेक्टेयर औसत कंद पैदावार प्राप्त होती हैं|

व्हाइट गौरेइया-

अरबी की यह किस्म रोपण के 180 से 190 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसके मातृ तथा पुत्री कंद व पत्तियां खाने योग्य होती हैं| इसकी पत्तियां डंठल और कंद खुजलाहट मुक्त होते हैं| उबालने या पकाने पर कंद शीघ्र पकते है| इस किस्म की औसत पैदावार 17 से 19 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

नरेन्द्र अरबी-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार के तथा हरे रंग के होते हैं| पर्णवृन्त का ऊपरी और मध्य भाग हरा निचला भाग हरा होता हैं| यह 170 से 180 दिनों में तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर हैं| इस किस्म की पत्तियॉ, पर्णवृन्त एवं कंद सभी पकाकर खाने योग्य होते हैं|

श्री पल्लवी-

यह किस्म 210 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 16 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

श्रीकिरण-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 17 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

सतमुखी-

यह किस्म 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

आजाद अरबी-

यह किस्म 135 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 28 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

मुक्ताकेशी-

यह किस्म 160 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

बिलासपुर अरूम-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

बीज की बुवाई एवं रोपण का समय | ARBI Farming Showing Time And Showing Methods

अरबी का रोपण जून से जुलाई (खरीफ फसल) में किया जाता हैं| उत्तरी भारत में इसे फरवरी से मार्च में भी लगाया जाता हैं|

बीज की मात्रा | Seed Rate For TARO Cropping

बीज दर किस्म और कंद के आकार तथा वजन पर निर्भर करती हैं| सामान्य रूप से 1 हेक्टेयर में रोपण हेतु 15 से 20 क्विटल कंद बीज की आवश्यकता होती हैं| इसके मातृ एवं पुत्री कंदों (20 से 25 ग्राम) दोनों को रोपण सामग्री हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं|

बीज उपचार | Seed Treatment for Taro Ki Kheti

कंदों को रिडोमिल एम जेड- 72 की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम कंद की दर से उपचारित करना चाहिए| कंदों को बुआई पूर्व फफूंदनाशक के घोल में 10 से 15 मिनट डुबाकर रखना चाहिए|

कंद रोपण विधियाँ |Tuber planting methods-

मेड़नाली विधि-

इस विधि में तैयार खेत में 60 सेंटीमीटर की दूरी पर मेड़ व नाली का निर्माण किया जाता हैं तथा 10 सेंटीमीटर उंची मेड पर 45 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्येक कंद बीज को 5 सेंटीमीटर की गहराई में रोपा जाता हैं|

ऊँची समतल क्यारी मेड़नाली विधि- इस विधि में खेत में 8 से 10 सेंटीमीटर ऊँची समतल क्यारियाँ बनाते हैं, जिसके चारो तरफ जल निकास नाली 50 सेंटीमीटर की होती हैं| इन क्यारियों पर लाईन की दूरी 60 सेंटीमीटर की रखते हुए 45 सेंटीमीटर के अंतराल पर बीजों का रोपण 5 सेंटीमीटर की गहराई पर किया जाता है| इस विधि में रोपण के दो माह बाद निंदाई-गुड़ाई के साथ उर्वरक की बची मात्रा देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढाकर बेड को मेडनाली में परिवर्तित करते हैं, यह विधि अरबी की खरीफ फसल के लिये उपयुक्त हैं|

नालीमेड विधि-

इस विधि में अरबी का रोपण 8 से 10 सेंटीमीटर गहरी नालियों में 60 से 65 सेंटीमीटर के अंतराल पर करना चाहिए| रोपण से पूर्व नालियों में आधार खाद और उर्वरक देना चाहिए| रोपण के 2 माह बाद बचे हुए उर्वरक की मात्रा देने के साथ नालियों को मिट्टी से उपर तक भर पौधों पर मिट्टी चढाकर मेड नाली पद्धति में परिवर्तित कर देना चाहिए| यह विधि रेतीली दोमट और नदी किनारे भूमि के लिए उपयुक्त हैं|

खाद और उर्वरक| Nutrition Management

अरबी के लिए भूमि तैयार करते समय 15 से 25 टन प्रति हेक्टेयर सडी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद और आधार उर्वरक को अंतिम जुताई करते समय मिला देना चाहिए| रासायनिक उर्वरक नत्रजन 80 से 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम और पोटाश 80 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग लाभप्रद हैं| नत्रजन तथा पोटाश की पहली मात्रा आधार के रूप में रोपण के पूर्व देना चाहिए| रोपण के एक माह नत्रजन की दूसरी मात्रा का प्रयोग निंदाई-गुड़ाई के साथ करना चाहिए| दो माह पश्चात् नत्रजन की तीसरी तथा पोटाश की दूसरी मात्रा को निंदाई-गुड़ाई के साथ देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढा देना चाहिए|

सिंचाई प्रबंधन | Irrigation Management

अरबी की पत्तियों का फैलाव ज्यादा होने के कारण वाष्पोत्सर्जन ज्यादा होता हैं| इसलिए प्रति इकाई पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से ज्यादा होती हैं| सिंचित अवस्था में रोपी गयी फसल में 7 से 10 दिन के अंतराल पर 5 माह तक सिंचाई आवश्यक हैं| वर्षा आधारित फसल में 15 से 20 दिन तक वर्षा न होतो सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए| परिपक्व होने पर भी अरबी की फसल हरी दिखती हैं, सिर्फ पत्तों का आकार छोटा हो जाता हैं| खुदाई के एक माह पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए, जिससे नये पत्ते नहीं निकलते हैं तथा फसल पूर्णरूपेण परिपक्व हो जाती हैं|

पैदावार | Yield

अरबी की खेती करने पर सामान्य अवस्था में अरबी से किस्म के अनुसार वर्षा आधारित फसल के रूप में 20 सर 25 टन तथा सिंचित अवस्था की फसल में 25 से 35 टन प्रति हेक्टेयर कंद पैदावार प्राप्त होती हैं| जब लगातार पत्तियों की कटाई की जाती है, तब कंद एवं कंदिकाओं की पैदावार 6 से 9 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, जबकि एक हेक्टेयर से 8 से 11 टन हरी पत्तियों की पैदावार होती हैं|

रागी/मंडुआ, कोदों, कुटकी की खेती | अलौकिक किंतु उपेक्षित अनाज



 धान, गेँहू के अलावा घांस कुल में मोटे अनाज वाली फसले जैसे जुआर, बाजरा तथा लघु धन्य जैसे कोदो, कुटी और रागी आती है। परम्पगत खाद्य श्रृंखला में इन फसलों का विशेष महत्व होता था और इसी बजह से पहले हमारी खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पोषण सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम था। अब इन फसलों का अस्तित्व खतरे में नज़र आ रहा है। एक तरफ हरित क्रांति के कारण धान और गेंहू की खेती के रकबे में भारी इजाफा हुआ और तदनुसार उत्पादन में भी आशातीत बढोत्तरी हुई। परन्तु मोटे (पोषक) अनाज वाली फसलो का रकबा निरंतर कम होता जा रहा है ।

दूसरी तरफ देश की सार्वजानिक वितरण प्रणाली में गेंहू और चावल को ही सर्वोपर्य स्थान मिला हुआ है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक में भी पोषण सुरक्षा मुहैया कराने वाले हमारे पारंपरिक अलौकिक अनाजो यथा मक्का, जुआर,बाजरा तथा लघु धन्य जैसे रागी, कोदो, कुटकी आदि को शामिल नहीं किया जाना भारत की भावी पीडी के लिए सुभ संकेत नहीं है।

भूली बिसरी इन फसलो को सरकार के समर्थन मूल्य का सहारा नहीं मिल पा रहा है। इन्ही कारणों से इन फसलो का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। भारत में 1410 लाख हैक्टेयर कुल कृषिगत क्षेत्रफल में से, लगभग 177 जिलो में, 850 लाख हैक्टेयर क्षेत्र सिंचाई के लिए मानसून वर्षा पर निर्भर है । यह देश के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र आता है । वर्षा निर्भर कृषि से देश में 44 प्रतिशत अनाज, 75 प्रतिशत दालें और 90 प्रतिशत से अधिक मात्रा में ज्वार, मूंगफली पैदा होती है । हालांकि आजादी के 50 सालो में वर्षा आधारित क्षेत्रो पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है, फिर भी यह क्षेत्र देश के अमूमन आधे ग्रामीण मजदूरो के लिए रोजगार और 60 प्रतिशत मवेशिय के लिए पोषण सुरक्षा भी उपलब्ध करा रहे है । मोटे अनाजो की खेती न केवल उत्पादन देती है वरन यह एक ऐसी विचारधारा है जिसके माध्यम से कृषक जैव विविधता, पारिस्थितिकीय उपज प्रणालियो तथा खाद्यान्न प्रधानता जैसे सिद्धातो को वास्तविकता में बदल देते है । वास्तव में यह एक अदभुत खाद्यान्न प्रणाली है जो भारत में खाद्यान्न व पोषण सुरक्षा के साथ- साथ हमारी परम्परागत कृषि के भविष्य को सुरक्षित रख सकती है । क्योकि गेंहू और चावल का मौजूदा उत्पादन तथा उपलब्ध अन्न भंडार प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुरूप देश भर की जनता की खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ती नहीं कर पायेगा। ऐसे में मोटे अनाजो को भी इसमें शामिल करना अनेक कारणों से बेहतर होगा। जुआर , बाजरा, रागी,कोदो, कुटकी, जौ, जई आदि भले ही गुणवत्ता में गेंहू और चावल के समान न हो लेकिन पोषण स्टार के मामले में वे उनसे बीस ही साबित होते है।

भरपूर पोषण देती है ये फसले –

पोषण के लगभग सभी मापदंडो से, यह अनाज चावल या गेंहू से आगे है । गेंहू व चावल के मुकाबले उनके अंदर खनिज पदार्थ की मात्रा काफी ज्यादा है । इनमें से प्रत्येक अनाज में चावल व गेंहू के मुकाबले ज्यादा रेशा रहता है । किसी-किसी अनाज में तो चावल से 50 गुणा ज्यादा । रागी में चावल के मुकाबले 30 गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है और बाकी अनाज की किस्मो में कम से कम दुगुना कैल्शियम रहता है । लौह तत्व में, काकुन और कुटकी इतने ज्यादा परिपूर्ण है कि चावल उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है । जहां हम बीटा कैटी न नामक सूक्ष्म-पुष्टिकारक दवाओ व गोलिओ में ढूंढते रहते है, अनाज की यह किस्में इससे भी परिपूर्ण है । यहां तक कि चावल जैसे लोकप्रिय खाद्य में यह महत्वपूर्ण सूक्ष्म-पुष्टिकारक है ही नही है । इसी प्रकार एक-एक पुष्टिकारक को देखें, तो अनाजो की हर किस्म चावल व गेंहू से कहीं ज्यादा उत्तम है और यही कारण है कि वे कुपोषण, जिससे भारत में काफी जन संख्या त्रस्त है, के लिए उत्तम उपाय है । तो क्यों ना हम इन अनाजो को मोटे अनाज की जगह पोषक अनाज के नाम से संबोधित करे।

इन अदभुत अनाजो के उत्पादन के लिए बहुत कम खाद- पानी की आवश्यकता पड़ती है । सिंचित और नगदी फसलें जिन्हे हमारी वर्तमान नीतियो में बढ़ावा दिया जा रहा है, के मुकाबले अनाज की इन प्रजातियो के सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती है । गन्ने तथा केले जैसी फसलो के मुकाबले इन फसलो को केवल 25 प्रतिशत वर्षा की ही आवश्यकता पड़ती है ।

इन अनाजो की फसल को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है । ज्वार, बाजरा और रागी के लिए गन्ने और केले के मुकाबले 25 प्रतिशत कम और धान के मुकाबले 30 प्रतिशत कम बारिश की जरूरत ह¨ती है । हम 1 किलो धान पैदा करने के लिए 4000 लीटर पानी का उपयोग करते है, जबकि इन सभी अनाजो की फसलें बिना सिंचाई के ही पैदा हो जाती है । ऐसे समय में जब पानी और खाद्यान्न की भारी कमी संभावित है, वहां अनाज की यह फसलें हमारे लिए खाद्यान्न सुरक्षा का साधन बन सकती है ।

फसल वर्षा की आवश्यकता के बारे में बात करें तो गन्ना 2000-2200 (मिमी), धान 1200-1300 (मिमी), कपास 600-650 (मिमी), मक्का 500-550 (मिमी), मूंगफली 450-500 (मिमी), मिर्च 600 (मिमी), ज्वार 400-500 (मिमी), बाजरा 350-400 (मिमी), रागी 350-400 (मिमी), दालें 300-350 (मिमी), तिल 300-350 (मिमी) की जलमाँग होती है। उपरोक्त बातो के अलावा मोटे अनाज की फसलें सभी प्रकार की भूमि-जलवायु में आसानी से उगाई जा सकती है साथ ही विभिन्न प्रकार के मौसमी उतार-चढ़ाव तथा परिस्थितिकीय संकट और कीट रोग व्याधियो को झेलने में सक्षम होती है।

ज्वार – ज्वार विश्व की एक मोटे अनाज वाली महत्वपूर्ण फसल है । पारंपरिक रूप से खाद्य तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इसकी खेती की जाती है, लेकिन अब यह संभावित जैव-ऊर्जा फसल के रूप में भी उभर रही है । खाद्यान्न फसलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्वार का भारत में तृतीय स्थान है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में ज्वार सबसे लोकप्रिय फसल हैं। एक ओर जहाँ ज्वार सूखे का सक्षमता से सामना कर सकती है, वहीं कुछ समय के लिये भूमि में जलमग्नता को भी सहन कर सकती है। ज्वार का पौधा अन्य अनाज वाली फसलों की अपेक्षा कम प्रकाष संष्लेषण एवं प्रति इकाई समय में अधिक शुष्क पदार्थ का निर्माण करता है।
ज्वार की पानी उपयोग करने की क्षमता भी अन्य अनाज वाली फसलों की तुलना में अधिक है। ज्वार की खेती उत्तरी भारत में खरीफ के मौसम में और दक्षिणी भारत में खरीफ एंव रबी दोनों मौसमों में की जाती है। ज्वार की खेती अनाज व चारे के लिये की जाती है। ज्वार को आजकल औद्यौगिक फसल के रूप में देखा जा रहा है ।सफेद ज्वार के आटे से ब्रेड, बिस्किट एवं केक बनाये जा सकते हैं। ज्वार के आटे के स्वाभाविक रूप से मीठा होने के कारण चीनी की मात्रा कम रखकर मधुमेह रोगियों के लिए अच्छा स्नैक तैयार किया जा सकता है। ब्रेड बनाने के लिए ज्वार और गेहूँ के आटे की मात्रा 60 प्रतिशत व 40 प्रतिशत रखी जाती है। सामान्य रूप से बीयर, जौ, मक्का अथवा धान से तैयार की जाती है, परन्तु ज्वार के अनाज से भी स्वादिश्ट एवं सुगंधित बियर बनाई जा सकती है, जो अन्य धान्य से बनाई बियर से सस्ती पड़ती है। ज्वार की विशेष किस्म से स्टार्च तैयार किया जाता है । अलकोहल उपलब्ध कराने का भी ज्वार एक उत्कृष्ट साधन है । इस प्रकार से ओद्योगिक क्षेत्रों में ज्वार की मांग बढ़ने से ज्वार उत्पादक किसानो को अब ज्वार की बेहतर कीमत प्राप्त हो रही है।

बाजरा – मोटे अनाज वाली फसलों में बाजरा (पेनीसीटम टाइफाइड) का महत्वपूर्ण स्थान है। बाजरा कम लागत तथा शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली ज्वार से भी लोकप्रिय फसल है जिसे दाने व चारे के लिए उगाया जाता है। यह गरीबो का मुख्य भोजन माना जाता है । अमीर लोग जाडे में कभी-कभी इसे स्वाद बदलने के लिए खाते है । इसका प्रभाव गर्म प्रकृति का होता है, अतः गर्म ऋतु में यथासंभव इसे नहीं खाना चाहिए ।
बाजरे के दाने में 12.4 प्रतिशत नमी, 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.05 प्रतिशत कैल्शियम, 0.35 प्रतिशत फास्फोरस तथा 8.8 प्रतिशत लोहा पाया जाता है।
इस प्रकार बाजरे का दाना ज्वार की अपेक्षा अधिक पौष्टिक होता है।बाजरे को खाने के काम में लाने से पूर्व इसके दाने को कूटकर भूसी अलग कर लिया जाता है। दानों को पीसकर आटा तैयार करते हैं और माल्टेड आटा के रूप में प्रयोग करते हैं। उत्तरी भारत में जाड़े के दिनों में बाजरा रोटी (चपाती) के रूप में खाया जाता है। बाजरे की र¨टी और दूध का भोजन चावल से भी अधिक पौष्टिक माना गया है । कुछ स्थानों पर बाजरे के दानों को चावल की तरह पकाया और खाया जाता है। गांवो में दाने की हरी बालियाँ भूनकर मक्के के भुट्टे की तरह खाई जाती हैं। दाने को भूनकर लाई भी बनाते हैं। इस प्रकार दाना भूनकर, उबालकर या आटा बनाकर प्रयोग में आता है ।बाजरा दुधारू पशुओं को दलिया एंव मुर्गियों को दाने के रूप में खिलाया जाता है।

लघु धान्य (मोटे अनाज)- मोटे अनाज छोटे दाने वाली धान्य फसलों को कहा जाता है। मिलेट धान्य प्रजाति के भारत में विकसित पौधे हैं, जिसके अन्र्तगत छोटे-छोटे परन्तु पौष्टिक दानों वाली कई फसलें शामिल हैं। मोटे अनाजों को लघोन्न फसलें भी कहा जाता है। यहाँ पर इस शब्द का प्रथम अर्द्ध भाग अर्थात् ’लघु’ का अभिप्राय इन फसलों के दाने के आकार का और शेष अंतिम भाग ’अन्न’ इन्हें खाद्यान्नों की श्रेणी में रखने का द्योतक है। मोटे या लघु धान्य फसलों में कोदों,रागी , कुटकी, सावाँ, काकुन आदि सम्मलित किये जाते हैं।
इन सभी फसलों के दानों का आकार इनके पौधों के आकार की अपेक्षा छोटा होता है। अतः इन्हें छोटे या मोटे या लघु धान्य के नाम से जाना जाता है। इन फसलों की खेती प्रायः शुष्क क्षेत्रों में की जाती है। इन खाद्यान्नों की खेती उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ की भूमि दूसरे उत्तम धान्य उगाने योग्य नहीं रहती है तथा अधिकांश क्षेत्र शुष्क खेती की परिधि में आते है। लघु धान्य फसलों की अवधि भी मुख्य फसलों की अपेक्षा बहुत कम होती है। इन फसलों में सूखा एंव अकाल जैसी विषम परिस्थितियों को सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है। इन फसलों पर कीट एंव रोगों का प्रकोप भी कम होता है। अतः इनको सूखाग्रस्त क्षेत्रों, सीमान्त भूमि और आदिवासी क्षेत्रों की आधारभूत फसलें माना जाता है।

सभी लघु धान्य फसलें दानें के रूप में रोटी बनाकर या कुछ फसलें चावल की भाँति उबालकर खाने के काम में लाई जाती हैं। दाने के अलावा इन फसलों से पशुओ के लिए चारा-भूसा भी प्राप्त होता है। देश के पहाड़ी-पठारी क्षेत्रों में अत्यधिक भौगौलिक विषमताओ के कारण ऐसी फसलों की उपयोगिता बढ़ जाती है जो असिंचित व कम उपजाऊ भूमि में उगाई जा सके।

रागी (मंडुआ) – भारत में उगाए जाने वाले लघु धान्यों में रागी (मंडुवा) सबसे महत्वपूर्ण एंव जीविका प्रदान करने वाला अन्न है। प्रायः गरीब आदिवासी लोग ही इसके दाने का प्रयोग खाने में करते है । खाने में इसका स्वाद भले ही अच्छा न लगें परन्तु रागी का दाना काफी पौष्टिक होता है जिसका आटा व दलिया बनाया जाता है। आटे से रोटी, पारिज, हलवा व पुडिंग तैयार किया जाता है। मधुमेय के रोगियो के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है। मधुमेह पीड़ित व्यत्कियों के लिए चावल के स्थान पर मंडुवा का सेवन उत्तम बताया गया है। कृषि महाविद्यालय, जगदलपुर के वैज्ञानिकों द्वारा रागी के प्रसंस्करण से आटा तैयार किया गया है जो कि मधुमेय पीड़ित व्यक्तियों के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है। रागी के अंकुरित बीजों से माल्ट भी बनाते हैं जो कि शिशु आहार तैयार करने में काम आता है। बहुत समय से इसके दानों से उत्तम गुणों वाली शराब भी तैयार की जाती है। बाबरनामा नामक पुस्तक में इसकी शराब का वर्णन मिलता है । इसके दाने की यह भी विशेषता है कि बिना खराब हुए रागी को अनेक वर्षो तक संचित रखा जा सकता है ।

कोदों – कोदो भारत का एक प्राचीन अन्न है जिसे ऋषि अन्न माना जाता था। यह एक जल्दी पकने वाली सबसे अधिक सूखा अवरोधी लघु धान्य फसल है। इसका प्रयोग उबालकर चावल की तरह खाने में किया जाता है। प्रयोग करने से पूर्व इसके दाने के ऊपर उपस्थित छिलके को कूटकर हटाना आवश्यक रहता है । इसकी उपज को लम्बे समय तक सहेज कर रखा जा सकता है तथा अकाल आदि की विषम परिस्थितियो में खाद्यान्न के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है । इसके दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा, 65.9 कार्बोहाइड्रेट तथा 2.9 प्रतिशत राख पाई जाती है। यह गरीबों की फसल मानी जाती है क्योकि इसकी खेती गैर-उपजाऊ भूमियों में बगैर खाद-पानी के की जाती है। मधुमेह के रोगियों के लिए चावल व गेहूँ के स्थान पर कोदों विशेष लाभकारी रहता है।

कुटकी – Panicum antidotale Retz
कुटकी वर्षा ऋतु की तमाम फसलो में सबसे पहले तैयार होने वाली धान्य प्रजाति की फसल है । संभवतः इसलिए इसे पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रो में अधिक पसंद किया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रो में इसे चिकमा नाम से भी जाना जाता है । इसे गरीबों की फसल की संज्ञा दी गई है। कुटकी जल्दी पकने वाली सूखा और जल भराव जैसी विषम परिस्थितियों को सहन करने वाली फसल है। यह एक पौष्टिक लघु धान्य हैं। इसके 100 ग्राम दाने में 8.7 ग्राम प्रोटीन, 75.7 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 5.3 ग्राम वसा, 8.6 ग्राम रेशा के अलावा खनिज तत्व, कैल्शियम एंव फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
उपरोक्त मोटे अलौकिक अनाजो को आज भले ही हमने खाद्य श्रृंखला से बाहर कर दिया हो परन्तु पशुओ एवं पछियो के भोजन तथा ओद्योगिक इस्तेमाल के कारण इनका अस्तित्व अभी भी बचा है। इनके महत्व को देखते हुए आज चिकित्सक भी इन अनाजो को भोजन में शामिल करने का सुझाव दे रहे है। पारम्परिक पाक विधिओ में मोटे अनाजो का इस्तेमाल शिशु आहार बनाने वाले उद्योग तथा अन्य खाद्य पदार्थो के उत्पादन में किया जा रहा है। जुआर का उपयोग ग्लूकोस और अन्य पेय निर्माण उद्योग में किया जा रहाएन्हु है अब रागी और गेंहू के मिश्रण से निर्मित वर्मिसिल बाजार में उपलब्ध है। सुपर मार्केट और माल में मल्टी-ग्रेन आटा अब नव धनाड्य वर्ग में लोकप्रिय होता जा रहा है।
भारत में लागू ऐतहासिक खाद्यान्न सुरक्षा कानून का हम स्वागत करते है। वास्तव में हमें खाद्यान्न सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। देश में बड़ी संख्या में बच्चे व युवा कुपोषित और अल्प भारित है जिनके सुपोषण की वयवस्था भी हमें करना चाहिए। हमारी परम्परागत फसलों से ही लोगो को पोष्टिक खाद्यान प्राप्त हो सकता है। मोटे अनाज वाली फासले असिंचित अथवा सूखाग्रस्त क्षेत्रो में सीमित लगत में आसानी से उगाई जा सकती है। अब तो इनका बाजार भाव भी अच्छा मिल रहा है। मोटे अनाजो के घटते उत्पादन और बढती मांग को देखते हुए इन फसलो की खेती को प्रोत्साहित कर खेती में विविधिता लाने का हम सब को मिल कर प्रयास करना चाहिए जिससे देश में बहुसंख्यक आबादी को खाद्यान्न सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा भी मुहैया हो सके।

टमाटर की फसल और समेकित नाशीजीव प्रबंधन

 


टमाटर

कीट नाशीजीव

  • फल बेधिक

फल बेधक के कारण टमाटर की पैदावार में अत्यधिक नुकसान होता है। इसकी पूरी तरह विकसित इल्लियाँ हल्की पीली हरे रंग की होती हैं जिनके दोनों किनारों पर पर गहरी मटमैली खंडित धारियां होती है। युवा सुंडीयां कोमल पत्तियों से भोजन ग्रहण करते हैं जबकि वयस्क सुंडीयां फल में वृताकार छेद कर घुस जाते हैं और फल का भीतरी भाग खाते रहते हैं। अकेली सुंडी 2 से 8 फलों को खाकर नष्ट कर सकती है।



  • सफेद मक्खी

इस कीट के वयस्क सफेद मोम फूल से ढकी सफेद छोटी परत की तरह दिखते हैं। अर्भक वयस्क मक्खियाँ पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। संक्रमित भाग पीला पड़ जाता है तथा पत्तियां अंदर की ओर मुड़ कर अंतत: मुरझा जाती है। रस चूसने के साथ – साथ ये कीट मधुरस मल त्याग करते हैं जिससे फफूंदी के विकास को बढ़ावा मिलता है तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बाधा आने से पौधे की वृद्धि रूक जाती है।


  • चेपा

टमाटर के चेपा का प्रकोप मुख्यतया शुष्क एवं मेघाच्छन्न मौसम में होता है। इसके बहु – गुणन के लिए ठंडी एवं नमी परिस्थिति अनुकूल होती है जबकि भारी वर्षा से चेपा कालोनियां घुलकर बह जाती हैं। टमाटर की फसल में तेजी से उड़ कर आ जाते हैं। चेपा, कोमल, प्ररोह एवं पत्तियों की निचली सतह पर से रस चूसते है जिससे पौधे के विकास की प्रक्रिया रूक जाती है।

प्रमुख रोग

  • आद्र गलन

शुरूआत में इस रोग के लक्षण नर्सरी में कुछ जगहों पर दिखाई पड़ते हैं परंतु 2-3 दिनों में ही पूरी नर्सरी में फैलकर सभी पौधे संक्रमित हो जाते हैं। पौधे अचानक ही मुर्झा जाते हैं और जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाते हैं। संक्रमित पौधे भूरे जल अवशोषित विक्षप्ति के साथ पीले हरे रंग के दिखाई देते हैं।

  • अगेती झुलसा

पौध स्थापना के तुरंत पश्चात नमी वाले मौसम में जब बसंत मौसम प्रारंभ होता है तब अगेती झुलसा रोग का प्रकोप होता है। इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों के किनारे के भाग पर छोटे काले गोलाकार धब्बे होते हैं जो धीरे – धीरे बढ़ते जाते हैं। इन काले धब्बे के बाहरी किनारे पीलापन लिए होते हैं जब धब्बे बढ़ते हैं तब संक्रमित पत्तियां मूर्झाकर फिर जाती हैं। इस रोग का प्रकोप पौधे के सभी भागों पर होता है। पत्ती झुलसा का प्रकोप सामान्यतया निचली व पुरानी पत्तियों से होकर पौधे में ऊपर तक बढ़ता है। इस रोक के कारण सीधे तौर पर फलों में संक्रमण और परोक्ष रूप से पौधे की ओजता में कमी के रूप में होता है। पत्तियों के ग्रसित होने पर फलों में सूर्य तपन संक्रमण भी होता है।

  • पछेती झुलसा

जब लंबे समय के लिए सुहावने मौसम के साथ नमी वाली परिस्थितियां बनी रहती हैं तब पछेती अंगमारी रोग का प्रकोप होता है। तेजी से फैलते रोग के कारण गंभीर आर्थिक नुकसान होता है। इसमें पौधे के किसी भी भाग पर भूरे – बैंगनी अथवा काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। पत्तियों पर दिखाई देने वाले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। पत्तियों पर दिखाई देने वाले धब्बे अनियमित, थोड़े बड़े, हरे – काले रंग के तथा जल का अवशोषण करने वाले होते हैं। ये धब्बे तेजी से बढ़कर भूरे हो जाते हैं और पत्तियों की निचली सतह के संक्रमित क्षेत्र के किनारों के समीप अथवा तने पर एक सफेद फफूंदी का विकास कर लेते हैं। यहाँ तक कि फलों के डंठल भी संक्रमित होकर काले पड़ जाते हैं।

  • जीवाणुज धब्बा

पत्ती पर पानी से भीगे धब्बे हरित पीले रंग के आवरण के साथ दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे भूरे रंग व विकृत रूप के दिखाई देते हैं। पके हुए फलों पर ये धब्बे गहरे पानी से भीगे हुए भूरे रंग से काले भूरे रंग के दिखाई देते हैं व बाद में इन धब्बों पर दरारें विकसित हो जाती हैं।

  • बक चक्षु सड़न

सबसे पहले संक्रमण अपरिपक्व, निचले फलों, जो कि मृदा से सटे होते हैं, उन पर पीले हरे रंग के वृत्त (वलय) स्पष्ट दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे भूरे और विकृत हो जाते हैं। पके फलों पर ये धब्बे कालापन लिए गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं व इनमें दरारें विकसित हो जाती है।

  • पर्ण कूंचन

यह टमाटर की एक प्रमुख बीमारी है जिसका फैलाव सफेद मक्खी द्वारा होता है। संक्रमित पौधों की पत्तियां मुड़ जाती हैं तथा पौधों की वृद्धि रूक जाती है। नई पत्तियों में हल्का पीला रंग दिखाई पड़ता है और बाद में उनमें व्याकूंचन लक्षण प्रकट होते हैं। पुरानी पत्तियों के किनारे मोटे एवं अंदर की ओर मुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं तथा अंतर जोड़ का आकार उल्लेखनीय रूप से छोटा हो जाता है। संक्रमित पौधा पीला लगने लगता है और रोग का अधिक संक्रमण होने पर पौधा बौना और झाड़ीनुमा दिखाई देने लगता है व इसमें फल की उत्पादकता न के बराबर रह जाती है।

सूत्रकृमी

  • जड़ गांठ सूत्र कृमि

यह एक सूक्ष्म मृदाजनित कृमि है जो जड़ का रोग ग्रस्त कर देता है जिससे पौधों के उपरी हिस्सों में पानी व पोषक तत्वों के पहुँचने में रूकावट होती है। प्रभावित पौधे कमजोर हो जाते हैं व पीली हो जाती हैं और फल उत्पादकता में कमी आ जाती है। जड़ के पूर्ण विकसित न होने से पौधा सूख जाता है

नर्सरी अवस्था

  • आद्र गलन रोग की रोकथाम के लिए अच्छी जल निकासी की व्यवस्था करें, इसके लिए जमीन से 10 सें. मी. ऊंची क्यारी बनाकर ही नर्सरी तैयारी करें।
  • नर्सरी की बुवाई से पहले मिट्टी को 0.45 मिमी मोटी पौलिथिन शीट से 2-3 सप्ताह तक ढककर मिट्टी का सूर्य तापीकरण करें। ऐसा करने से मृदाजनित रोगों के नियंत्रण से सहायता मिलती है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे. ।
  • विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त 50 ग्राम ट्राईकोडर्मा की सक्षम स्ट्रेन (कालोनी इकाइयों के गठन/CFU: 2x100/ग्राम) को 3 किलो ग्राम गोबर की खाद में मिलाएं और 7-14 दिनों के लिए संवर्धन के लिए छोड़ दें व उसके पश्चात 3 वर्ग मीटर क्यारी में ट्राईकोडर्मा संवर्धित खाद को मिट्टी में मिला दें।
  • सफेद मक्खी जैसे रोगवाहकों के नियंत्रण के लिए मलमल जाली (40 गेज) का इस्तेमाल करें।
  • आद्र – गलन के नियंत्रण हे. तु 10 ग्रा. प्रति बीज ट्राईकोडर्मा या कैप्टन 70 डब्ल्यूपी के साथ (0.25 प्रतिशत स.त.) की दर से बीजोपचार करें। आवश्यकता होने पर कैप्टन 70 डब्ल्यू पी 0.25 प्रतिशत की दर से मिट्टी में मिला दें।
  • टमाटर नर्सरी से 20 दिन पूर्व अलग से गेंदा की पौध तैयार करें।

मुख्य फसल के दौरान

  • चूसक कीटों तथा सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण हेतु रोपाई से पूर्व इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल के 7 मिली प्रति ली. पानी के मिश्रित घोल में टमाटर पौध की जड़ों को 15 मिनट तक डूबोकर रखना चाहिए।
  • पुष्पन समकलिता के लिए टमाटर की प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद 45 दिन पुराने गेंदा के पौधों की एक पंक्ति फसल प्रपंच के रूप में लगानी चाहिए। पहली व अंतिम पंक्ति गेंदा फसल की होनी चाहिए और इन पर 250 एलई प्रति हे. एचएएनपीवी का छिड़काव करना चाहिय।
  • रोगों के फैलने की संभावना को कम करने के लिए टमाटर की किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60x45 सेंमी तथा संकर किस्मों के लिए 90x90 सेंमी की दूरी रखें।
  • पर्ण सुरंगक, चेपा तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात नीम अर्क 5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • आवश्यकता पड़ने पर सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात् इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 150 मिली अथवा थिओमैथाक्स्म 25  डब्ल्यू जी का 200 ग्रा अथवा स्पायरोमेसिफिन 22.9 एससी का 625 मिली अथवा डायमिथोएट 30 ईसी 990 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल वेधक, पर्ण सुरंगक एवं सूत्रकृमियों के प्रकोप को कम करने के लिए पौध रोपण के 20 दिन पश्चात् 250 किग्रा प्रति हे. की दर से नीम की खली का प्रयोग करें।
  • कुटकी के नियंत्रण हेतु फेनाजैकविन 10 ईसी 12 50  मिली अथवा स्पाइरोमेसीफैन 22.9 ईसी का 625 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल बेधक सक्रियता की निगरानी के लिए 2 फेरामोन प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगाएं। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अंतराल पर पुराने ल्योर के स्थान पर ताजा ल्योर लगायें।
  • पौधों के शीर्ष तीन पणों की निगरानी फल बेधक के अण्डों के लिए करें।
  • अंडे के परजीवी ट्राईकोग्रामा प्रैटियोसम को 1.0 लाख प्रति हे. की दर से एक सप्ताह के अन्तराल पर फूल आंरभ होने की अवस्था से 4 – 5 बार छोड़ें।
  • गेंदा के फूलों और कलियों में फल बेधक नष्ट करने के लिए एचएएनपीवी (250 एल ई) (2x100) का शाम का समय छिड़काव करें।
  • टमाटर की पौध रोपने के 28, 35 एवं 42 दिनों के के पश्चात एचइ एनपीवी (250 एलई प्रति हे.) (2x100 पीओबी)  का शाम के समय छिड़काव करें। सूर्य की अल्ट्रा – वायलेट किरणों से तीव्र अपघटन रोकने के लिए 2 प्रतिशत गुड़ मिलाकर छिड़काव करें।
  • फल बेधक क्षतिग्रस्त फलों को समय समय पर एकत्रित कर नष्ट कर दें। ऐसा करना सूंडी का एक फल से दुसरे फल में पहुँचने से रोकने के लिए अनिवार्य है।
  • फल बेधक का अधिक प्रकोप होने पर केवल आवश्यकता होने पर रासयनिक कीटनाशक जैसे क्लोराएन्ट्रानीलीप्रोल 18.5 एससी का 150 मिली या नोवाल्यूरोन 10 ईसी 750 मिली की दर से या इंडोक्साकार्व 14.5 एससी 400 मिली की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पर्ण कुंचन संक्रमित पौधों को नियमित रूप से एकत्रित कर नष्ट कर दें।
  • अगेती एवं पछेती झुलसा के नियंत्रण हे. तु केप्टान 50 डब्ल्यू 2.5 किग्रा प्रति हे. . 1000 लिटर पानी के साथ या मेंकोजेब 75 डब्ल्यूपी 1.5-2 किग्रा प्रति हे.  की दर से 750 – 1000 लिटर पानी के साथ सुरक्षात्मक छिड़काव करें और आवश्यकतानुसार एजोक्सीस्ट्रोबिन 23 प्रतिशत एससी का 500 मिली प्रति हे. कि दर से 500 लिटर पानी के साथ या मेटालेक्सिल 3.3 प्रतिशत + क्लोरोथेलोनील 33.1 प्रतिशत एससी 1000 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ मौसम और फसल अवस्थानुसार छिड़काव करें। सायमोक्सानिल 8 प्रतिशत + मेंकोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1.5 किग्रा या ट्यूबीकोनाजोल 50 प्रतिशत + ट्राई फ्लोक्साईट्रोबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 350 ग्रा प्रति हे. कि दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बक अक्षु सड़न के प्रकोप को कम करने के लिए टमाटर के पौधों में डंडे लगाकर उनको सहारा दें और आवश्यकतानुसार मैंकोजेब 75 डब्ल्यूपी 1.5-2.0 किग्रा 750 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बैक्टीरियल सूखा रोग के नियंत्रण हेतु पौध पर स्ट्रैप टोसायक्लीन (40 – 100 पी पी एम) घोल का छिड़काव खेत में करें।

मित्र कीटों का संरक्षण

टमाटर फसलचक्र में मित्र कीटों का अवांक्षित और रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक छिड़काव से संरक्षण किया जाना         चाहिए।

बंदगोभी/फूलगोभी की फसल में वैधिक समेकित नाशीजीव प्रबंधन युक्तियाँ

बीज/ नर्सरी अवस्था

  • अच्छी जल निकासी हेतु एवं डैंपिंग ऑफ आदि से बचने के लिए जमीन की सतह से लगभग 10 सेंटीमीटर ऊपर

उठी हुई क्यारी तैयार करें। नर्सरी की बुवाई से पहले मिट्टी को 0.45 मिमी मोटी पालीथिन शीट से 2-3 सप्ताह तक ढककर मिट्टी सूर्य तापिकरण करें। इसके लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

  • क्यारी की मिट्टी को 50 या ग्राम प्रति वर्ग मीटर नीम की खली से उपचारित करें।
  • सड़न रोग से बचाव हेतु बीज को ट्राईकोडर्मा को प्रभावी स्ट्रेन से 4 ग्रा. प्रति किग्रा बीज से उपचार करें। ट्राईकोडर्मा 1 प्रतिशत डब्ल्यू पी में 10 ग्राम प्रति ली की दर से पानी मिलाकर इस घोल में पौध को 30 मिनट डूबायें ताकि सड़न रोग से बचाव किया जा सकें
  • नर्सरी के दौरान रोगों के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडर्मा की 250 ग्राम मात्रा को 3 किग्रा गोबर की सड़ी बारीक़ खाद अच्छी प्रकार मिलाकर एक सप्ताह के लिए छोड़ दें। बाद में 3 वर्ग मीटर क्यारी में मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें।
  • डैम्पिंग ऑफ़ के नियंत्रण के लिए कैप्टान 75 डब्ल्यूपी 0.25 प्रतिशत अथवा कैप्टान 75 डब्ल्यू एस 0.2 से 0.3 प्रतिशत की दर से प्रयोग करें।
  • बरसाती मौसम में पैंटीड बग एवं पछेती रबी मौसम में चेपा से बचाव हेतु इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस से 5 ग्रा प्रति किग्रा की दर से बीज उपचार करें।
  • यदि फसल में 1 लार्वा/पत्ती की दर से हरिक पृष्ठ शलभ उपस्थित हो तो 3 ग्रा प्रति ली की दर से बेसिलस थ्रूजायनसिस का छिड़काव करें।
  • मृदुरोमिल फफूंद के लिए 2.5 ग्राम प्रति ली. जल की दर से मेंकोजेब 75 डब्ल्यूपी या मेटालेक्सिल, मेंकाजेब 35 एससी का छिड़काव करें।
  • कभी – कभी बरसात के मौसम में नर्सरी में दिखाई देने वाले तना छेदक की की रोकथाम के लिए एनएस केई 5 प्रतिशत या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी का 1600 ग्रा प्रति हे. की दर से छिड़काव करें।

मुख्य फसल

  • रोगों के फैलाव को कम करने के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60x45  सेंमी रखें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ तथा चेंपा के लिए बंदगोभी की प्रत्येक 25 कतारों के बाद फंदा फसल के रूप में सरसों की एक कतार उगायें (बंदगोभी की रोपाई के 15 दिन पूर्व सरसों की एक कतार बोई जाती है तथा बंदगोभी की रोपाई के 25 दिन बाद दूसरी कतार बोई जाती है)। खेत में पहली और आखिरी कतार सरसों की होनी चाहिए। सरसों की फसल जैसे ही अंकुरित हो उस पर 0.1 प्रतिशत की दर से डाईक्लोरोवोवास 76 ईसी या क्यूनालफास 25 ईसी का 1.5 मिली प्रति ली जल के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के लिए रोपाई के 10 दिन बाए 3 ग्रा प्रति ली. की दर से बेसिलस थ्रूजायनसिस का छिड़काव करें तथा 3 प्रकाश पाश अर्थात बल्ब/एकड़ की दर से लगायें। कीट के वयस्क प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं और पानी से भरी बाल्टी में गिर जाते हैं। 3-4 दिनों में अधिकांश कीट मर जाते हैं।
  • हीरक पृष्ठ शलभ की निगरानी के लिए 2 फोरोमों प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगायें। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अंतराल पर फोरमों ल्यूर को बदलें।
  • एक सप्ताह के अन्तराल पर 1.0 लाख प्रति हे. की दर से 3 – 4 बार अंडा परजीव्याभ ट्राईकोग्रमाटोडी बैक्ट्री फसल न छोड़ें।
  • आल्टोर्नेरिया पत्ती धब्बे के लिए मेंकोजेब 75 डब्ल्यू अथवा जिनेब 75 डब्ल्यू पी का 1.5 – 2.0  किग्रा प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें। संक्रमित पत्तियों को पौधों से तोड़कर हटा देना प्रभावी होता है।
  • ताना बेधक के लिए एनएसकेई 5 प्रतिशत या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी का 1000 ग्राम अथवा मलाथीयोन 50 ईसी का 1500 मिली प्रति हे. की दर से 1000 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के नियंत्रण के लिए आरंभिक अवस्था (रोपाई के 18-25 दिन बाद) में एनएसकेई 5 प्रतिशत का छिड़काव करें। 10 – 15 दिन के अन्तराल पर प्रति पौधा कीट के एक से अधिक संख्या होने पर यह छिड़काव दोहराएँ। एक फसल मौसम में अधिक से अधिक 3-4 एनएसकेई छिड़कावों की आवश्यकता होती है। जब एनएसकेई का छिड़काव किया जाना होतो पूरे पौधे की सतह पर भली प्रकार छिड़काव किया जाना आवश्यक है। छिड़काव के साथ किसी स्टीकर का प्रयोग करें। इससे चेपा का भी नियंत्रण होगा। इसके लिए 40 किग्रा प्रति हे. एनएसकेई पाउडर की आवश्यकता होगी।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के नियंत्रण के लिए आवश्यकता के अनुसार साइपरमेथ्रिन 10 ईसी का 650 मिली प्रति हे. या स्पिनासेड 2.5 एससी का 10 ग्रा प्रति हे. या एमेमेकटिनबेंजोएट 5 एसजी का 150 ग्रा प्रति हे. अथवा क्लोरएट्रानीलीप्रोल 18.5 एससी 50 मिली प्रति हे.  अथवा नोवे ल्यूरान 10 ईसी 750 मिली प्रति हे. अथवा इन्डोक्सकार्ब 15.8 एससी का 266 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फूलगोभी की पछेती फसल में चेपा के नियंत्रण के लिए 75 ग्रा प्रति हे. की दर से एसिटामाईप्रीड 20 ईसी या डायमीथायोएट 30 ईसी का 650 मिली प्रति हे. की दर से 500 – 1000 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पंखदार चेपा को फसाने के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप लगायें।
  • तम्बाकू की इल्ली के अंड समूहों तथा लार्वों को एकत्रित करें क्योंकि ये झूंड में रहने वाले प्रकृति के होते हैं।
  • वयस्क भृंगों की क्रिया की निगरानी तथा इनके झूंडों को फंदों में फंसाने के लिए 5 प्रति हे. की दर से फिरोमान फंदे लगायें।
  • जब सूंडियां युवा हो तो एसएल एनपीवी  (2x100 पीओबी) 250 एलई प्रति हे. की दर से प्रतिशत गुड के साथ 2-3 बार छिड़काव करें।
  • तम्बाकू की इल्ली के नियंत्रण के लिए साईंएन्ट्रानीलीप्रोल 10.26 ओडी 600 ग्रा प्रति हे.  या ट्राईक्लोरफोन 50 ईसी 750 ग्रा प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
  • पेंटिड बग के नियंत्रण के लिए आवश्यकतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी का 660 मिली प्रति हे. दर से छिड़काव करें

भिंडी की खेती : भिंडी आर्का की जैविक खेती कैसे करें

  भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) पूरे देश मे की जाती है। भिंडी की मांग पूरे साल रहती है । और ऑफ सीजन में भिंडी का रेट भी अच्छा मिलता है । ...