Monday, August 14, 2023

टमाटर की फसल और समेकित नाशीजीव प्रबंधन

 


टमाटर

कीट नाशीजीव

  • फल बेधिक

फल बेधक के कारण टमाटर की पैदावार में अत्यधिक नुकसान होता है। इसकी पूरी तरह विकसित इल्लियाँ हल्की पीली हरे रंग की होती हैं जिनके दोनों किनारों पर पर गहरी मटमैली खंडित धारियां होती है। युवा सुंडीयां कोमल पत्तियों से भोजन ग्रहण करते हैं जबकि वयस्क सुंडीयां फल में वृताकार छेद कर घुस जाते हैं और फल का भीतरी भाग खाते रहते हैं। अकेली सुंडी 2 से 8 फलों को खाकर नष्ट कर सकती है।



  • सफेद मक्खी

इस कीट के वयस्क सफेद मोम फूल से ढकी सफेद छोटी परत की तरह दिखते हैं। अर्भक वयस्क मक्खियाँ पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। संक्रमित भाग पीला पड़ जाता है तथा पत्तियां अंदर की ओर मुड़ कर अंतत: मुरझा जाती है। रस चूसने के साथ – साथ ये कीट मधुरस मल त्याग करते हैं जिससे फफूंदी के विकास को बढ़ावा मिलता है तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बाधा आने से पौधे की वृद्धि रूक जाती है।


  • चेपा

टमाटर के चेपा का प्रकोप मुख्यतया शुष्क एवं मेघाच्छन्न मौसम में होता है। इसके बहु – गुणन के लिए ठंडी एवं नमी परिस्थिति अनुकूल होती है जबकि भारी वर्षा से चेपा कालोनियां घुलकर बह जाती हैं। टमाटर की फसल में तेजी से उड़ कर आ जाते हैं। चेपा, कोमल, प्ररोह एवं पत्तियों की निचली सतह पर से रस चूसते है जिससे पौधे के विकास की प्रक्रिया रूक जाती है।

प्रमुख रोग

  • आद्र गलन

शुरूआत में इस रोग के लक्षण नर्सरी में कुछ जगहों पर दिखाई पड़ते हैं परंतु 2-3 दिनों में ही पूरी नर्सरी में फैलकर सभी पौधे संक्रमित हो जाते हैं। पौधे अचानक ही मुर्झा जाते हैं और जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाते हैं। संक्रमित पौधे भूरे जल अवशोषित विक्षप्ति के साथ पीले हरे रंग के दिखाई देते हैं।

  • अगेती झुलसा

पौध स्थापना के तुरंत पश्चात नमी वाले मौसम में जब बसंत मौसम प्रारंभ होता है तब अगेती झुलसा रोग का प्रकोप होता है। इस रोग से ग्रसित पौधों की पत्तियों के किनारे के भाग पर छोटे काले गोलाकार धब्बे होते हैं जो धीरे – धीरे बढ़ते जाते हैं। इन काले धब्बे के बाहरी किनारे पीलापन लिए होते हैं जब धब्बे बढ़ते हैं तब संक्रमित पत्तियां मूर्झाकर फिर जाती हैं। इस रोग का प्रकोप पौधे के सभी भागों पर होता है। पत्ती झुलसा का प्रकोप सामान्यतया निचली व पुरानी पत्तियों से होकर पौधे में ऊपर तक बढ़ता है। इस रोक के कारण सीधे तौर पर फलों में संक्रमण और परोक्ष रूप से पौधे की ओजता में कमी के रूप में होता है। पत्तियों के ग्रसित होने पर फलों में सूर्य तपन संक्रमण भी होता है।

  • पछेती झुलसा

जब लंबे समय के लिए सुहावने मौसम के साथ नमी वाली परिस्थितियां बनी रहती हैं तब पछेती अंगमारी रोग का प्रकोप होता है। तेजी से फैलते रोग के कारण गंभीर आर्थिक नुकसान होता है। इसमें पौधे के किसी भी भाग पर भूरे – बैंगनी अथवा काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। पत्तियों पर दिखाई देने वाले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। पत्तियों पर दिखाई देने वाले धब्बे अनियमित, थोड़े बड़े, हरे – काले रंग के तथा जल का अवशोषण करने वाले होते हैं। ये धब्बे तेजी से बढ़कर भूरे हो जाते हैं और पत्तियों की निचली सतह के संक्रमित क्षेत्र के किनारों के समीप अथवा तने पर एक सफेद फफूंदी का विकास कर लेते हैं। यहाँ तक कि फलों के डंठल भी संक्रमित होकर काले पड़ जाते हैं।

  • जीवाणुज धब्बा

पत्ती पर पानी से भीगे धब्बे हरित पीले रंग के आवरण के साथ दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे भूरे रंग व विकृत रूप के दिखाई देते हैं। पके हुए फलों पर ये धब्बे गहरे पानी से भीगे हुए भूरे रंग से काले भूरे रंग के दिखाई देते हैं व बाद में इन धब्बों पर दरारें विकसित हो जाती हैं।

  • बक चक्षु सड़न

सबसे पहले संक्रमण अपरिपक्व, निचले फलों, जो कि मृदा से सटे होते हैं, उन पर पीले हरे रंग के वृत्त (वलय) स्पष्ट दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे भूरे और विकृत हो जाते हैं। पके फलों पर ये धब्बे कालापन लिए गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं व इनमें दरारें विकसित हो जाती है।

  • पर्ण कूंचन

यह टमाटर की एक प्रमुख बीमारी है जिसका फैलाव सफेद मक्खी द्वारा होता है। संक्रमित पौधों की पत्तियां मुड़ जाती हैं तथा पौधों की वृद्धि रूक जाती है। नई पत्तियों में हल्का पीला रंग दिखाई पड़ता है और बाद में उनमें व्याकूंचन लक्षण प्रकट होते हैं। पुरानी पत्तियों के किनारे मोटे एवं अंदर की ओर मुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं तथा अंतर जोड़ का आकार उल्लेखनीय रूप से छोटा हो जाता है। संक्रमित पौधा पीला लगने लगता है और रोग का अधिक संक्रमण होने पर पौधा बौना और झाड़ीनुमा दिखाई देने लगता है व इसमें फल की उत्पादकता न के बराबर रह जाती है।

सूत्रकृमी

  • जड़ गांठ सूत्र कृमि

यह एक सूक्ष्म मृदाजनित कृमि है जो जड़ का रोग ग्रस्त कर देता है जिससे पौधों के उपरी हिस्सों में पानी व पोषक तत्वों के पहुँचने में रूकावट होती है। प्रभावित पौधे कमजोर हो जाते हैं व पीली हो जाती हैं और फल उत्पादकता में कमी आ जाती है। जड़ के पूर्ण विकसित न होने से पौधा सूख जाता है

नर्सरी अवस्था

  • आद्र गलन रोग की रोकथाम के लिए अच्छी जल निकासी की व्यवस्था करें, इसके लिए जमीन से 10 सें. मी. ऊंची क्यारी बनाकर ही नर्सरी तैयारी करें।
  • नर्सरी की बुवाई से पहले मिट्टी को 0.45 मिमी मोटी पौलिथिन शीट से 2-3 सप्ताह तक ढककर मिट्टी का सूर्य तापीकरण करें। ऐसा करने से मृदाजनित रोगों के नियंत्रण से सहायता मिलती है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे. ।
  • विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त 50 ग्राम ट्राईकोडर्मा की सक्षम स्ट्रेन (कालोनी इकाइयों के गठन/CFU: 2x100/ग्राम) को 3 किलो ग्राम गोबर की खाद में मिलाएं और 7-14 दिनों के लिए संवर्धन के लिए छोड़ दें व उसके पश्चात 3 वर्ग मीटर क्यारी में ट्राईकोडर्मा संवर्धित खाद को मिट्टी में मिला दें।
  • सफेद मक्खी जैसे रोगवाहकों के नियंत्रण के लिए मलमल जाली (40 गेज) का इस्तेमाल करें।
  • आद्र – गलन के नियंत्रण हे. तु 10 ग्रा. प्रति बीज ट्राईकोडर्मा या कैप्टन 70 डब्ल्यूपी के साथ (0.25 प्रतिशत स.त.) की दर से बीजोपचार करें। आवश्यकता होने पर कैप्टन 70 डब्ल्यू पी 0.25 प्रतिशत की दर से मिट्टी में मिला दें।
  • टमाटर नर्सरी से 20 दिन पूर्व अलग से गेंदा की पौध तैयार करें।

मुख्य फसल के दौरान

  • चूसक कीटों तथा सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण हेतु रोपाई से पूर्व इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल के 7 मिली प्रति ली. पानी के मिश्रित घोल में टमाटर पौध की जड़ों को 15 मिनट तक डूबोकर रखना चाहिए।
  • पुष्पन समकलिता के लिए टमाटर की प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद 45 दिन पुराने गेंदा के पौधों की एक पंक्ति फसल प्रपंच के रूप में लगानी चाहिए। पहली व अंतिम पंक्ति गेंदा फसल की होनी चाहिए और इन पर 250 एलई प्रति हे. एचएएनपीवी का छिड़काव करना चाहिय।
  • रोगों के फैलने की संभावना को कम करने के लिए टमाटर की किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60x45 सेंमी तथा संकर किस्मों के लिए 90x90 सेंमी की दूरी रखें।
  • पर्ण सुरंगक, चेपा तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात नीम अर्क 5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • आवश्यकता पड़ने पर सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात् इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल 150 मिली अथवा थिओमैथाक्स्म 25  डब्ल्यू जी का 200 ग्रा अथवा स्पायरोमेसिफिन 22.9 एससी का 625 मिली अथवा डायमिथोएट 30 ईसी 990 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल वेधक, पर्ण सुरंगक एवं सूत्रकृमियों के प्रकोप को कम करने के लिए पौध रोपण के 20 दिन पश्चात् 250 किग्रा प्रति हे. की दर से नीम की खली का प्रयोग करें।
  • कुटकी के नियंत्रण हेतु फेनाजैकविन 10 ईसी 12 50  मिली अथवा स्पाइरोमेसीफैन 22.9 ईसी का 625 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल बेधक सक्रियता की निगरानी के लिए 2 फेरामोन प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगाएं। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अंतराल पर पुराने ल्योर के स्थान पर ताजा ल्योर लगायें।
  • पौधों के शीर्ष तीन पणों की निगरानी फल बेधक के अण्डों के लिए करें।
  • अंडे के परजीवी ट्राईकोग्रामा प्रैटियोसम को 1.0 लाख प्रति हे. की दर से एक सप्ताह के अन्तराल पर फूल आंरभ होने की अवस्था से 4 – 5 बार छोड़ें।
  • गेंदा के फूलों और कलियों में फल बेधक नष्ट करने के लिए एचएएनपीवी (250 एल ई) (2x100) का शाम का समय छिड़काव करें।
  • टमाटर की पौध रोपने के 28, 35 एवं 42 दिनों के के पश्चात एचइ एनपीवी (250 एलई प्रति हे.) (2x100 पीओबी)  का शाम के समय छिड़काव करें। सूर्य की अल्ट्रा – वायलेट किरणों से तीव्र अपघटन रोकने के लिए 2 प्रतिशत गुड़ मिलाकर छिड़काव करें।
  • फल बेधक क्षतिग्रस्त फलों को समय समय पर एकत्रित कर नष्ट कर दें। ऐसा करना सूंडी का एक फल से दुसरे फल में पहुँचने से रोकने के लिए अनिवार्य है।
  • फल बेधक का अधिक प्रकोप होने पर केवल आवश्यकता होने पर रासयनिक कीटनाशक जैसे क्लोराएन्ट्रानीलीप्रोल 18.5 एससी का 150 मिली या नोवाल्यूरोन 10 ईसी 750 मिली की दर से या इंडोक्साकार्व 14.5 एससी 400 मिली की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पर्ण कुंचन संक्रमित पौधों को नियमित रूप से एकत्रित कर नष्ट कर दें।
  • अगेती एवं पछेती झुलसा के नियंत्रण हे. तु केप्टान 50 डब्ल्यू 2.5 किग्रा प्रति हे. . 1000 लिटर पानी के साथ या मेंकोजेब 75 डब्ल्यूपी 1.5-2 किग्रा प्रति हे.  की दर से 750 – 1000 लिटर पानी के साथ सुरक्षात्मक छिड़काव करें और आवश्यकतानुसार एजोक्सीस्ट्रोबिन 23 प्रतिशत एससी का 500 मिली प्रति हे. कि दर से 500 लिटर पानी के साथ या मेटालेक्सिल 3.3 प्रतिशत + क्लोरोथेलोनील 33.1 प्रतिशत एससी 1000 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ मौसम और फसल अवस्थानुसार छिड़काव करें। सायमोक्सानिल 8 प्रतिशत + मेंकोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1.5 किग्रा या ट्यूबीकोनाजोल 50 प्रतिशत + ट्राई फ्लोक्साईट्रोबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 350 ग्रा प्रति हे. कि दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बक अक्षु सड़न के प्रकोप को कम करने के लिए टमाटर के पौधों में डंडे लगाकर उनको सहारा दें और आवश्यकतानुसार मैंकोजेब 75 डब्ल्यूपी 1.5-2.0 किग्रा 750 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बैक्टीरियल सूखा रोग के नियंत्रण हेतु पौध पर स्ट्रैप टोसायक्लीन (40 – 100 पी पी एम) घोल का छिड़काव खेत में करें।

मित्र कीटों का संरक्षण

टमाटर फसलचक्र में मित्र कीटों का अवांक्षित और रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक छिड़काव से संरक्षण किया जाना         चाहिए।

बंदगोभी/फूलगोभी की फसल में वैधिक समेकित नाशीजीव प्रबंधन युक्तियाँ

बीज/ नर्सरी अवस्था

  • अच्छी जल निकासी हेतु एवं डैंपिंग ऑफ आदि से बचने के लिए जमीन की सतह से लगभग 10 सेंटीमीटर ऊपर

उठी हुई क्यारी तैयार करें। नर्सरी की बुवाई से पहले मिट्टी को 0.45 मिमी मोटी पालीथिन शीट से 2-3 सप्ताह तक ढककर मिट्टी सूर्य तापिकरण करें। इसके लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

  • क्यारी की मिट्टी को 50 या ग्राम प्रति वर्ग मीटर नीम की खली से उपचारित करें।
  • सड़न रोग से बचाव हेतु बीज को ट्राईकोडर्मा को प्रभावी स्ट्रेन से 4 ग्रा. प्रति किग्रा बीज से उपचार करें। ट्राईकोडर्मा 1 प्रतिशत डब्ल्यू पी में 10 ग्राम प्रति ली की दर से पानी मिलाकर इस घोल में पौध को 30 मिनट डूबायें ताकि सड़न रोग से बचाव किया जा सकें
  • नर्सरी के दौरान रोगों के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडर्मा की 250 ग्राम मात्रा को 3 किग्रा गोबर की सड़ी बारीक़ खाद अच्छी प्रकार मिलाकर एक सप्ताह के लिए छोड़ दें। बाद में 3 वर्ग मीटर क्यारी में मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें।
  • डैम्पिंग ऑफ़ के नियंत्रण के लिए कैप्टान 75 डब्ल्यूपी 0.25 प्रतिशत अथवा कैप्टान 75 डब्ल्यू एस 0.2 से 0.3 प्रतिशत की दर से प्रयोग करें।
  • बरसाती मौसम में पैंटीड बग एवं पछेती रबी मौसम में चेपा से बचाव हेतु इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस से 5 ग्रा प्रति किग्रा की दर से बीज उपचार करें।
  • यदि फसल में 1 लार्वा/पत्ती की दर से हरिक पृष्ठ शलभ उपस्थित हो तो 3 ग्रा प्रति ली की दर से बेसिलस थ्रूजायनसिस का छिड़काव करें।
  • मृदुरोमिल फफूंद के लिए 2.5 ग्राम प्रति ली. जल की दर से मेंकोजेब 75 डब्ल्यूपी या मेटालेक्सिल, मेंकाजेब 35 एससी का छिड़काव करें।
  • कभी – कभी बरसात के मौसम में नर्सरी में दिखाई देने वाले तना छेदक की की रोकथाम के लिए एनएस केई 5 प्रतिशत या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी का 1600 ग्रा प्रति हे. की दर से छिड़काव करें।

मुख्य फसल

  • रोगों के फैलाव को कम करने के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60x45  सेंमी रखें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ तथा चेंपा के लिए बंदगोभी की प्रत्येक 25 कतारों के बाद फंदा फसल के रूप में सरसों की एक कतार उगायें (बंदगोभी की रोपाई के 15 दिन पूर्व सरसों की एक कतार बोई जाती है तथा बंदगोभी की रोपाई के 25 दिन बाद दूसरी कतार बोई जाती है)। खेत में पहली और आखिरी कतार सरसों की होनी चाहिए। सरसों की फसल जैसे ही अंकुरित हो उस पर 0.1 प्रतिशत की दर से डाईक्लोरोवोवास 76 ईसी या क्यूनालफास 25 ईसी का 1.5 मिली प्रति ली जल के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के लिए रोपाई के 10 दिन बाए 3 ग्रा प्रति ली. की दर से बेसिलस थ्रूजायनसिस का छिड़काव करें तथा 3 प्रकाश पाश अर्थात बल्ब/एकड़ की दर से लगायें। कीट के वयस्क प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं और पानी से भरी बाल्टी में गिर जाते हैं। 3-4 दिनों में अधिकांश कीट मर जाते हैं।
  • हीरक पृष्ठ शलभ की निगरानी के लिए 2 फोरोमों प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगायें। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अंतराल पर फोरमों ल्यूर को बदलें।
  • एक सप्ताह के अन्तराल पर 1.0 लाख प्रति हे. की दर से 3 – 4 बार अंडा परजीव्याभ ट्राईकोग्रमाटोडी बैक्ट्री फसल न छोड़ें।
  • आल्टोर्नेरिया पत्ती धब्बे के लिए मेंकोजेब 75 डब्ल्यू अथवा जिनेब 75 डब्ल्यू पी का 1.5 – 2.0  किग्रा प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें। संक्रमित पत्तियों को पौधों से तोड़कर हटा देना प्रभावी होता है।
  • ताना बेधक के लिए एनएसकेई 5 प्रतिशत या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी का 1000 ग्राम अथवा मलाथीयोन 50 ईसी का 1500 मिली प्रति हे. की दर से 1000 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के नियंत्रण के लिए आरंभिक अवस्था (रोपाई के 18-25 दिन बाद) में एनएसकेई 5 प्रतिशत का छिड़काव करें। 10 – 15 दिन के अन्तराल पर प्रति पौधा कीट के एक से अधिक संख्या होने पर यह छिड़काव दोहराएँ। एक फसल मौसम में अधिक से अधिक 3-4 एनएसकेई छिड़कावों की आवश्यकता होती है। जब एनएसकेई का छिड़काव किया जाना होतो पूरे पौधे की सतह पर भली प्रकार छिड़काव किया जाना आवश्यक है। छिड़काव के साथ किसी स्टीकर का प्रयोग करें। इससे चेपा का भी नियंत्रण होगा। इसके लिए 40 किग्रा प्रति हे. एनएसकेई पाउडर की आवश्यकता होगी।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के नियंत्रण के लिए आवश्यकता के अनुसार साइपरमेथ्रिन 10 ईसी का 650 मिली प्रति हे. या स्पिनासेड 2.5 एससी का 10 ग्रा प्रति हे. या एमेमेकटिनबेंजोएट 5 एसजी का 150 ग्रा प्रति हे. अथवा क्लोरएट्रानीलीप्रोल 18.5 एससी 50 मिली प्रति हे.  अथवा नोवे ल्यूरान 10 ईसी 750 मिली प्रति हे. अथवा इन्डोक्सकार्ब 15.8 एससी का 266 मिली प्रति हे. की दर से 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फूलगोभी की पछेती फसल में चेपा के नियंत्रण के लिए 75 ग्रा प्रति हे. की दर से एसिटामाईप्रीड 20 ईसी या डायमीथायोएट 30 ईसी का 650 मिली प्रति हे. की दर से 500 – 1000 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पंखदार चेपा को फसाने के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप लगायें।
  • तम्बाकू की इल्ली के अंड समूहों तथा लार्वों को एकत्रित करें क्योंकि ये झूंड में रहने वाले प्रकृति के होते हैं।
  • वयस्क भृंगों की क्रिया की निगरानी तथा इनके झूंडों को फंदों में फंसाने के लिए 5 प्रति हे. की दर से फिरोमान फंदे लगायें।
  • जब सूंडियां युवा हो तो एसएल एनपीवी  (2x100 पीओबी) 250 एलई प्रति हे. की दर से प्रतिशत गुड के साथ 2-3 बार छिड़काव करें।
  • तम्बाकू की इल्ली के नियंत्रण के लिए साईंएन्ट्रानीलीप्रोल 10.26 ओडी 600 ग्रा प्रति हे.  या ट्राईक्लोरफोन 50 ईसी 750 ग्रा प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
  • पेंटिड बग के नियंत्रण के लिए आवश्यकतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी का 660 मिली प्रति हे. दर से छिड़काव करें

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